Warning: Cannot assign an empty string to a string offset in /var/www/the2ishindi.com/public/wp-includes/class.wp-scripts.php on line 426

Warning: Cannot assign an empty string to a string offset in /var/www/the2ishindi.com/public/wp-includes/class.wp-scripts.php on line 426

Warning: Cannot assign an empty string to a string offset in /var/www/the2ishindi.com/public/wp-includes/class.wp-scripts.php on line 426

Warning: Cannot assign an empty string to a string offset in /var/www/the2ishindi.com/public/wp-includes/class.wp-scripts.php on line 426

Warning: Cannot assign an empty string to a string offset in /var/www/the2ishindi.com/public/wp-includes/class.wp-scripts.php on line 426

असामयिक मौतों को रोकने में मददगार हो सकती है सोशल एटॉप्सी

172 0
  • चंडीगढ़ पीजीआई के शोधकर्ताओं ने इस टूल का इस्‍तेमाल कर असमय होने वाली मौतों के कारणों का पता लगाया

नई दिल्‍ली। कई बार बेहतर चिकित्सकीय सुविधाओं के बावजूद लोग समय से पहले मौतों का शिकार बन जाते हैं। भारतीय शोधकर्ताओं के एक ताजा अध्ययन में इस तरह की असमय मौतों के लिए स्वास्थ्य प्रणाली, सामाजिक और व्यावहारिक कारणों को संयुक्त रूप से जिम्मेदार पाया गया है। ये नतीजे सोशल एटॉप्‍सी टूल का इस्‍तेमाल कर निकाले गए हैं।

किसने किया शोध ?

चंडीगढ़ स्थित स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (PGIMER) के शोधकर्ताओं ने यह शोध किया है। शोधकर्ताओं ने वयस्कों की असमय मृत्यु के सामाजिक कारणों का पता लगाने के लिए विकसित किए गए एकीकृत एटॉप्सी टूल का इस्‍तेमाल किया। इस एटॉप्सी टूल के उपयोग से प्राप्त नतीजों में कई प्रमुख सामाजिक तथ्य उभरकर आए हैं। शोधकर्ताओं की टीम में डॉ. मनमीत कौर के अलावा ममता गुप्ता, पीवीएम लक्ष्मी, शंकर प्रिंजा, तरुणदीप सिंह, तितिक्षा सिरारी और राजेश कुमार शामिल थे।

पंजाब में तैयार हुआ डाटाबेस

इस अध्ययन में पंजाब के एक ग्रामीण विकासखंड क्षेत्र में स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, सहायक नर्स, मिडवाइफ, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, सरपंच, शिक्षकों इत्यादि से एक साल के दौरान 600 लोगों की मौत के बारे में जानकारी हासिल की गई। शोधकर्ताओं ने मृतकों की आयु, लिंग, जाति, वैवाहिक स्थिति, शिक्षा और व्यवसाय आदि की जानकारियों के आधार पर सोशल एटॉप्सी डाटाबेस तैयार किया।

शोध में क्‍या पता चला ?

शोधकर्ताओं के अनुसार, अध्ययन में शामिल 21 प्रतिशत लोगों की प्राकृतिक मृत्यु हुई थी जबकि 16 प्रतिशत पक्षाघात, 8.5 प्रतिशत कैंसर, 7.7 प्रतिशत हृदयाघात और 5.7 प्रतिशत मौतें दुर्घटनाओं के कारण हुई थीं। इनमें 12 प्रतिशत का घरेलू इलाज चल रहा था। 70.7 प्रतिशत लोगों को इलाज के लिए बाहर ले जाया गया था और 17.3 प्रतिशत लोगों की मौत बिना किसी देखभाल या इलाज न होने के कारण हुई थी। अध्ययन में शामिल लोगों में लगभग 29.1 प्रतिशत शराब पीते थे और अधिकतर लोग शराब की लत के कारण बीमारियों से ग्रस्त थे। 8.2 प्रतिशत लोग धूम्रपान और 11.8 प्रतिशत लोग तम्बाकू चबाने की लत के शिकार थे। इसके अलावा 2.7 प्रतिशत लोग ऐसे भी थे, जो ड्रग्स का सेवन करते थे। इस तरह की सभी बुरी लतों का शिकार सिर्फ पुरुषों को ही पाया गया है। यह शोध हाल में ‘प्लाज वन’ नामक रिसर्च जर्नल में प्रकाशित किया गया है।

शोधकर्ताओं ने क्‍या निकाला निष्‍कर्ष ?

शोधकर्ताओं ने एटॉप्‍सी टूल के जरिए जो निष्‍कर्ष निकाले हैं, उनसे पता चलता है कि असामयिक मौतों के लिए कई सामाजिक कारण भी जिम्‍मेदार हैं। इनमें ग्रामीण इलाकों में समय पर डॉक्टरों का न मिलना, डॉक्टर तथा रोगी के बीच संवाद की कमी, दवाओं का नियमित इस्‍तेमाल न करना, मरीजों को बड़े अस्पताल तक ले जाने के लिए देर से परामर्श मिलना, परिवार के सदस्यों को बीमारी के बारे में पता न चलना या देर से पता चलना और परिजनों द्वारा बीमारी को गंभीरता से न लेना शामिल हैं।

क्‍या कहते हैं प्रमुख शोधकर्ता  ?

इस अध्ययन में शामिल प्रमुख शोधकर्ता डॉ. मनमीत कौर ने बताया कि चिकित्सा सेवाओं के विकास के बावजूद ग्रामीण इलाकों में बीमारियों और नशे की लत के प्रति सामाजिक जागरूकता नहीं होना वयस्कों की मृत्यु का एक बड़ा कारण है। सामाजिक जागरूकता नहीं होने के कारण अक्सर लोग पीलिया, लकवा, सांप काटने जैसी समस्याओं में डॉक्‍टर को न दिखाकर घरेलू उपचार या झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं। खासतौर पर बुजुर्गों और महिलाओं की ज्‍यादा उपेक्षा की जाती है और उनके इलाज में लापरवाही बरती जाती है। परिवार में युवाओं की प्रवृत्तियों की तरफ ध्यान नहीं देने से भी समस्या को बढ़ावा मिलता है। डॉ. कौर कहते हैं कि ऐसी मौतों को रोकने के लिए समय पर चिकित्सा उपलब्ध होना और सामाजिक हस्तक्षेप बहुत महत्वपूर्ण हैं।

क्‍या है सोशल एटॉप्‍सी ?

चिकित्सकीय भाषा में एटॉप्सी का अर्थ चीरफाड़ द्वारा शव का परीक्षण करने से लगाया जाता है। वास्तव में एटॉप्सी मृत्यु के कारणों को जानने की प्रक्रिया है। चीरफाड़ के अलावा वर्बल और सोशल एटॉप्सी भी होती है। वर्बल एटॉप्सी में जहां मृतक के परिजनों से मौखिक बातचीत की जाती है, वहीं सोशल एटॉप्सी के अंतर्गत असमय मृत्यु के लिए जिम्मेदार सामाजिक परिस्थितियों की पड़ताल की जाती है। सामान्य तौर पर सोशल एटॉप्सी का उपयोग मातृ एवं शिशु मृत्यु और कुछ विशेष बीमारियों के लिए ही किया जाता है। इस अध्ययन में सोशल एटॉप्सी का उपयोग असमय मौतों के सामाजिक कारणों का पता लगाने के लिए किया गया है। सोशल एटॉप्सी जैसे टूल की मदद से देश के अन्य क्षेत्रों में भी मृत्यु के सामाजिक कारणों की पहचान की जा सकती है और असामयिक मौतों को रोका जा सकता है।

Related Post

राहुल-हार्दिक की हुई सीक्रेट मीटिंग, पाटीदार नेता ने रखीं ये 3 शर्तें!

Posted by - October 24, 2017 0
पाटीदार नेता हार्दिक पटेल और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की होटल ताज में हुई मुलाकात पर संशय बना हुआ है.…

टीम इंडिया के कोच रवि शास्त्री खुद से 20 साल छोटी इस एक्ट्रेस संग कर रहे डेट !

Posted by - September 3, 2018 0
मुंबई। बॉलीवुड और क्रिकेट जगत का नाता काफी पुराना है। क्रिकेट स्टार्स और बॉलीवुड एक्ट्रेसेस की लव स्टोरी का कनेक्शन…

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *