कहीं आप भी तो नहीं हैं ‘सेल्फाईटिस’ से ग्रसित ?

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लखनऊ। लोगों में सेल्फी लेने का क्रेज सिर्फ भारत में ही नहीं,  पूरी दुनिया में ‘महामारी’ की तरह फ़ैल रहा है। ये असल में एक बीमारी ही हैI एक ताजा रिसर्च में बताया गया है कि ‘सेल्फाईटिस’ एक मानसिक विकार है जिसमें इंसान में सेल्फी लेने का ‘जूनून’  सामान्य सीमा से कहीं ज्यादा हो जाता है। ये कैसे पता चले कि किस व्यक्ति में यह विकार मौजूद है, इसका पता लगाने के लिए वैज्ञानिकों ने एक टेस्ट निर्धारित किया हैI

क्‍या है ‘सेल्फाईटिस’ ?

‘सेल्फाईटिस’ शब्द का ईजाद 2014 में हुआ था। इंग्लैंड की नाटिंघम ट्रेंट यूनिवर्सिटी और भारत के मदुरै स्थित त्यागराजर स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट ने यह पता लगाने के लिए एक शोध किया कि क्या वाकई में ऐसा कोई मानसिक विकार होता है? अध्ययन में पता चला कि सेल्फाईटिस वाकई में एक विकार है। यह शोध ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड एडिक्शन’ में प्रकाशित हुआ है।

‘सेल्फाईटिस’ की हैं 3 कैटेगरी

शोध में यह भी पता चला कि ‘सेल्फाईटिस’ नामक इस विकार के तीन स्टेज हैं – बॉर्डरलाइन, एक्यूट और क्रोनिक। जो लोग बॉर्डरलाइन कैटेगरी में हैं वो दिन में तीन बार सेल्फी लेते हैं, लेकिन उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं करते।I एक्यूट कैटेगरी में इंसान रोजाना तीन सेल्फी सोशल मीडिया पर पोस्ट करता है। वहीं क्रोनिक कंडीशन में चौबीसों घंटे सेल्फी लेने की उत्कंठा बनी रहती है और दिन में 6 से ज्यादा बार फेसबुक और इंस्‍टाग्राम पर उसको पोस्ट भी किया जाता है।I

भारत में सेल्फी से जुड़ीं सर्वाधिक मौतें

शोधकर्ताओं ने सेल्फाईटिस का पता लगाने के लिए 20 सवालों की एक प्रश्नावली तैयार की है जिसके आधार पर सेल्फाईटिस की तीव्रता का पता चलता है। शोध के अनुसार, भारत में सेल्फी संबंधी सर्वाधिक मौतें होती हैं और पूरी दुनिया में सेल्फी से जुड़ी मौतों का 60 फीसदी भारत में होता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, सेल्फाईटिस से ग्रस्त व्यक्ति में लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की व्यग्रता होती है। ऐसे लोगों में आत्मविश्वास की कमी होती हैI। ऐसे लोग सोशल मीडिया पर इस चाहत में सेल्फी पोस्ट करते हैं ताकि उनकी समाज में मजबूत मौजूदगी बन सके और वे स्वयं को एक समूह का हिस्सा महसूस कर सकेंI।

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