समाज का हीरो: INTOLERANCE के दौर में अजय ने लिखी इंसानियत की नई इबारत

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चंडीगढ़। आज जबकि कुछ लोग फिरकापरस्ती में समाज को बांटने की कोशिश कर रहे हैं, हिंदुओं और मुसलमानों के बीच खाई पैदा करने की कोशिश की जा रही है, चंडीगढ़ के पंचकूला में रहने वाले एक हिंदू ने एक मुसलमान की मदद करने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया। समाज के इस हीरो का नाम है अजय वालिया। आइए, जानते हैं अजय के समाज का हीरो बनने की कहानी उन्हीं की जुबानी…

अजय उन्हें कहते हैं गफूर चाचा
‘ये गफूर चाचा हैं। बहुत दिन बाद मिलने सीधे मेरे स्कूल आ गए। गफूर चाचा मेरे ससुराल किशनपुरा (यमुनानगर) के पास के गाँव कुटीपुर से हैं। ससुराल के पास के गाँव से होने के चलते मेरे बच्चे इन्हें नाना बोलते हैं। गफूर चाचा से मेरा संबंध हमदर्दी और प्यार का है। गफूर चाचा उन चंद लोगों में से एक हैं, जिनसे जुड़ने के बाद मैंने माना कि दिल के रिश्ते खून के रिश्तों से ज्यादा बड़े होते हैं। बशर्ते दोनों व्यक्ति इस रिश्ते को इतनी ही शिद्दत से निभाएं।’

गफूर चाचा ने गंवा दिया था बेटा
15 दिसम्बर 2012 को मैं अपने ससुराल गया हुआ था कि सवेरे-सवेरे नाश्ता करते हुए सामने पड़े अखबार पर नजर गई। जिस की एक headline सामने थी कि “टैक्स बैरियर पर करन्ट लगने से मजदूर की मौत”। इस खबर में जिस मजदूर की मौत का ब्योरा था वो ससुराल के पास का गांव कुटीपुर था। मन में जिज्ञासा उठी, तो ससुर जी ने बताया कि इस मजदूर का पिता गफूर भी मजदूर है। बहुत गरीब लोग हैं। दो दिन पहले बिजली विभाग ने बिना सूचना दिए वहां लाइन गिराई हुई थी। जिसकी चपेट में आने से गफूर का बेटा मर गया। मैंने पूछा बिजली विभाग पर कोई एफआईआर दर्ज हुई ? किसी ने बिजली विभाग से बात की? ससुर जी बोले- हम लोग गए थे, पर वहां बिजली वाले टालमटोल कर गए। एफआईआर का पता नहीं। बस पता नहीं कि दिल नहीं माना और मैं अपने बड़े साले साहब अमित को साथ लेके निकल पड़ा गफूर चाचा के घर।

गुरबत में था गफूर का परिवार
‘गफूर के गांव पहुंचे। जहां से उसके घर गए। घर बिल्कुल छान का बना हुआ था और उसका गेट इतना छोटा था कि झुक के अंदर जाना पड़ा था। गफूर की अधेड़ उम्र की बीवी मिली। उसने बताया कि गफूर काम पर चला गया है क्योंकि घर में जो पैसे थे वो बेटे के जनाजे और दूसरे वजहों पर खर्च हो गए। उधार किसी से मिला नहीं, तो वो काम पर चला गया। ये कहकर वो हमारे लिए पानी लेने चली गई। मेरा दिमाग फटने वाली हालत में था कि भगवान तुम कहाँ हो ? जिसने 2 दिन पहले अपना जवान बच्चा खोया, वो आज परिवार का पेट भरने की मजबूरी में कौन से मन से दिहाड़ी कर रहा होगा।

गफूर को न्याय दिलाने की जंग
‘मैंने संपर्क करके गफूर चाचा को बुलाया और विश्वास दिलाया कि मैं उठाऊंगा उसकी आवाज। गफूर चाचा को भी पता नहीं क्यों पहली ही बार में मुझ पर ऐतबार हो गया। बस मन बन गया कि मैं लड़ूंगा ये केस। वहां से थाने। थाने से बिजली विभाग। पहले बिजली वाले अड़े रहे कि जो होता है कर लो, पर उसी शाम गफूर चाचा का फोन आया तो पता चला कि वो जनाजे के खर्च के तौर पर और कुछ दिन के गफूर चाचा के खर्च के लिए 60 हजार रुपए अस्थायी मुआवजे के तौर पर देके गए हैं। मन को तसल्ली मिली कि कोशिश करूँ तो बुजुर्ग को और मुआवजा मिल जाएगा।’

मुआवजे के लिए हर जगह दस्तक दी
‘इसके बाद कोर्ट, वकील… मानवाधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, मुख्यमंत्री, सब जगह represntation दिए। केस की तारीख को लेके कभी मैं गफूर चाचा से मिलता तो कभी चाचा घर आ जाते। कोर्ट में मामला आया। केस चला। 3 साल बाद 5 लाख रुपए अदालत ने गफूर चाचा के खाते में डलवा दिये। बेटे की कमी तो मां-बाप के लिए कोई पूरा नहीं कर सकता। हां, मुआवजे के पैसे ने कुछ मरहम लगा दिया। अब हमने केस अगले कोर्ट में डाला।’
 
गफूर ने जब निभाया चाचा होने का धर्म
‘पैसे मिले अभी मुश्किल से एक महीना हुआ था कि गफूर चाचा ने मुझे फोन किया। मैंने नहीं उठाया क्योंकि पिता जी अस्पताल में एडमिट थे और next day उनका एक बड़ा ऑपरेशन होना था । ऑपरेशन को डॉक्टर सीरियस बता रहे थे। उसके बाद थोड़ी थोड़ी देर बाद गफूर चाचा के कई फोन आए। आखिर मैंने थोड़ा गुस्से के साथ फोन उठाया और चाचा से बोला- जब मैं फोन नहीं उठा रहा हूँ तब आपको समझना चाहिए कि मैं बिजी हूँ। अच्छा बताइये क्या बात है? गफूर चाचा ने कहा कि बस यूं ही फोन कर लिया। घर सब ठीक है ना। मैंने सारी बात बताई कि मैं अस्पताल में हूँ और पिता जी का ऑपरेशन होना है। बोले कि मैं आ रहा हूं। मैने कहा चाचा ये अस्पताल पंचकूला में है। आपको पता नहीं मिलेगा। आप मत आना। ये कहकर मैंने फोन काट दिया। 5-6 घण्टे बाद शाम के 8 बजे मुझे दोबारा चाचा का फोन आया। मैंने उठा लिया तो बोले कि बेटा कहां हो ? मैंने कहा अस्पताल में हूं। बोले- मैं अस्पताल के बाहर हूं।

गफूर साथ लाए थे 2 लाख रुपए
मैं हैरान था क्योंकि मैंने ये तो बताया ही नहीं था कि मैं किस अस्पताल में हूं। मैंने कहा आपने मुझे कैसे ढूंढ लिया ? उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि बेटा जिस खुदा ने तुझको मेरे दर्द में मेरे पास भेजा था उसी खुदा ने मुझे तेरे पास भेज दिया। वो पहले मेरे घर नारायणगढ़ गए। वहां घरवालों से एड्रेस लेके यहां आ गए। इसके बाद उन्होंने अपने एक फ़टे से थैले में हाथ डाला और पुराने से कपड़े में लिपटा हुआ एक बंडल मेरे हाथ पर रखा और बोले- ये रख लो। मैंने कपड़ा हटाया तो दो लाख रुपए मेरे हाथ में थे। बोले- ये पैसे रख लो। अभी ये पैसे मेरे किसी काम के नहीं।

बड़ी मुश्किल से माने गफूर
‘मैं कभी उन पैसों को कभी गफूर चाचा को देख रहा था। आंखे बरस पड़ी थीं। मैंने कहा- चाचा मुझे पैसे की जरूरत नहीं है। मेरे लिए तो यही बड़ा अहसान था आपका कि आप यहां तक आए। पैसे वापिस लो। वो नहीं माने, तो मैंने बताया कि मेरे पापा और मैं दोनों सरकारी मुलाजिम हैं तो हमारी बीमारी का खर्च सरकार उठाती है। तो मैंने जबरदस्ती वो पैसे वापस कर दिए।’

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