निर्भया कांड : दोषियों ने लगाई सुप्रीम कोर्ट से गुहार, फांसी की सजा उम्रकैद में बदलें

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  • विनय व पवन के वकील ने कहा –  फांसी की सजा मानवाधिकारों का हनन, सुधरने का एक मौका दें

नई दिल्‍ली। सुप्रीम कोर्ट ने 5 मई, 2017 को निर्भया कांड के 4 दोषियों की मौत की सजा को बहाल रखा था। निचली अदालत ने उन्‍हें फांसी की सजा सुनाई थी जिसे हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था। शुक्रवार को दया की गुहार लगाते हुए दो दोषियों ने पुनर्विचार याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने कोर्ट से कहा कि उनकी फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया जाए ताकि उन्हें सुधरने का एक मौका मिल सके। कोर्ट ने फिलहाल पुनर्विचार याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है।

क्‍या कहा दोषियों के वकील ने ?

फांसी की सजा पाए विनय शर्मा और पवन गुप्ता की तरफ से पेश हुए उनके वकीलों ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस आर भानुमति की पीठ के सामने दलील दी कि फांसी की सजा उनके मानवाधिकारों का हनन करती है। दोनों वकीलों ने पीठ से अनुरोध किया कि अभियुक्तों की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि और घटना से पहले के उनके साफ रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए उनके प्रति करुणा दिखाई जाए। वकीलों ने दलील देते हुए कहा कि कई आदतन अपराधियों में समय के साथ सुधार आया है। इसी वजह से उनके मुवक्किलों की सजा को मृत्यदंड से आजीवन कारावास में बदलकर उन्हें भी सुधरने का एक मौका मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि मौत की सजा अहिंसा और सहिष्णुता वाली भारतीय संस्‍कृति के खिलाफ है।

कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

कोर्ट ने सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है और वकीलों से कहा है कि वह इस बात को लिखित रूप में दें। पीठ ने कहा कि अगर कोई पक्ष लिखित दलीलें पेश करना चाहता है तो वह 8 मई तक पेश कर सकता है। उधर, दिल्ली पुलिस की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि निर्भया के आरोपियों ने कोई भी ऐसा नया तर्क नहीं दिया है, जिस पर कोर्ट ने मौत की सजा देने से पहले विचार ना किया हो।

एक दोषी ने नहीं दी है पुनर्विचार याचिका

बता दें कि निर्भया कांड में फांसी की सजा पा चुके विनय, पवन और मुकेश ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर की हैं लेकिन चौथे दोषी अक्षय ने अब तक पुनर्विचार याचिका नहीं दायर की है। इससे पहले कोर्ट ने आरोपी मुकेश शर्मा द्वारा दाखिल की गई पुनर्विचार याचिका पर भी अपना फैसला सुरक्षित रखा हुआ है। मालूम हो कि निचली अदलत ने दोषियों को फांसी की सजा सुनाई थी। बाद में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने सजा को बरकरार रखा था।

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