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देश के इन 6 न्यायाधीशों के खिलाफ भी चल चुका है महाभियोग

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नई दिल्ली। कांग्रेस के नेतृत्व में 7 विपक्षी दलों ने शुक्रवार (20 अप्रैल) को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया न्‍यायमूर्ति दीपक मिश्रा पर ‘गलत आचरण’ का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू को महाभियोग का नोटिस दिया। वैसे आपको बता दें कि यह पहला मौका नहीं है जब किसी जस्टिस के खिलाफ महाभियोग लाया गया है। जस्टिस दीपक मिश्रा से पहले भी 6 न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग प्रस्‍ताव लाया गया था। आइए, जानते हैं ये जज कौन हैं और इनके खिलाफ क्‍या थे आरोप –

जस्टिस वी. रामास्वामी 

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी. रामास्वामी पहले ऐसे न्‍यायाधीश थे जिनके खिलाफ 1993 में महाभियोग की कार्यवाही शुरू की गई थी। वित्‍तीय अनियमितता के आरोपों के बाद उनके खिलाफ लोकसभा में महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया था, लेकिन प्रस्‍ताव के समर्थन में दो तिहाई बहुमत नहीं जुट पाया था। खास बात यह रही कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के 205 सदस्यों ने सदन में चर्चा के दौरान मौजूद रहते हुए भी मतदान में हिस्सा ही नहीं लिया। प्रस्ताव के पक्ष में मात्र 196 मत पड़े, लेकिन कांग्रेस और मुस्लिम लीग के 205 सदस्यों ने सदन में चर्चा के दौरान उपस्थित रहते हुए भी मतदान में हिस्सा ही नहीं लिया। प्रस्ताव के पक्ष में मात्र 196 मत पड़े, लेकिन महाभियोग प्रस्ताव के विरोध में एक भी मत नहीं पड़ा।

जस्टिस सौमित्र सेन

कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश सौमित्र सेन देश के इतिहास में ऐसे दूसरे न्‍यायाधीश हैं, जिन्‍हें कदाचार के आरोप में महाभियोग का सामना करना पड़ा। जस्टिस सेन को साल 2011 में राज्यसभा ने वित्तीय गड़बड़ी और गलत तथ्य बताने का दोषी पाया था। राज्यसभा ने 18 अगस्त को न्यायमूर्ति सेन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी। बसपा के अलावा सभी पार्टियों का मानना था कि सेन दोषी हैं। हालांकि लोककसभा में महाभियोग की कार्यवाही शुरू होने से 5 दिन पहले ही जस्टिस सेन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

जस्टिस पीडी दिनाकरण

वर्ष 2011 में सिक्किम हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस न्‍यायमूर्ति पीडी दिनाकरण भूमि पर कब्जा करने, भ्रष्टाचार और न्यायिक पद का दुरुपयोग करने के मामले में विवादों में आए थे। राज्यसभा के 75 सांसदों ने जस्टिस दिनाकरण के विरुद्ध महाभियोग चलाने की मांग की थी। जस्टिस दिनाकरण ने जनवरी, 2010 में गठित जांच समिति के एक आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी। हालांकि जस्टिस दिनाकरण ने अपने खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही राष्‍ट्रपति प्रतिभा पाटील को अपना इस्तीफा भेज दिया था। इस तरह उन्हें महाभियोग की प्रक्रिया के जरिये पद से हटाने का मामला वहीं खत्म हो गया।

जस्टिस जेबी पर्दीवाला

वर्ष 2015 में गुजरात हाईकोर्ट के न्यायाधीश जेबी पर्दीवाला के खिलाफ राज्यसभा के 58 सदस्यों ने महाभियोग का नोटिस भेजा था। उन्हें यह नोटिस आरक्षण के मुद्दे पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने और पाटीदार नेता हार्दिक पटेल के खिलाफ एक मामले में फैसले को लेकर दिया गया था। हालांकि जैसे ही सदस्यों ने महाभियोग का नोटिस राज्यसभा सभापति हामिद अंसारी को भेजा, उसके कुछ ही घंटों बाद जस्टिस पर्दीवाला ने फैसले से अपनी टिप्पणी वापस ले ली थी।

जस्टिस एसके गंगले

वर्ष 2015 मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जस्‍ट‍िस एसके गंगले के खिलाफ एक महिला न्यायाधीश के यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगे थे। इसके बाद राज्यसभा के 58 सदस्यों ने महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस सभापति को दिया था। इसके आधार पर जांच के लिए समिति गठित होने के बावजूद जस्‍ट‍िस गंगले ने इस्तीफा देने की बजाय जांच का सामना किया। करीब दो साल तक चली जांच में जस्टिस गंगले के ऊपर यौन उत्पीड़न का एक भी आरोप साबित नहीं हो पाया, इसके कारण उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव सदन में पेश नहीं हो सका।

जस्टिस नागार्जुन रेड्डी

वर्ष 2016 में आंध्र और तेलंगाना हाईकोर्ट के न्यायाधीश नागार्जुन रेड्डी पर एक दलित न्यायाधीश को प्रताड़ित करने के लिए पद का दुरुपयोग करने का आरोप लगा था। इसके कारण राज्यसभा के 61 सदस्यों ने उनके खिलाफ महाभियोग चलाने के लिए प्रस्‍ताव दिया था। हालांकि जिन राज्यसभा सदस्यों ने रेड्डी के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने का प्रस्ताव दिया था, उनमें से 9 ने बाद में अपने हस्ताक्षर वापस ले लिए थे।

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