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सही मायनों में गैर-कांग्रेसवाद के शिल्पी थे डॉ. राम मनोहर लोहिया

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  • डॉ. लोहिया का कथन – जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं’, आज भी प्रासंगिक

समाजवादी आंदोलन के महानायक डॉ. राम मनोहर लोहिया की आज (23 मार्च ) 108वीं जयंती है। राजनीतिक अधिकारों के पक्षधर रहे डॉ. राम मनोहर लोहिया ऐसी समाजवादी व्‍यवस्‍था चाहते थे जिसमें सभी लोगों की बराबर की हिस्‍सेदारी रहे। वह कहा करते थे कि सार्वजनिक धन समेत किसी भी तरह की संपत्ति पर प्रत्‍येक नागरिक का अधिकार होना चाहिए। डॉ. लोहिया ने कभी भी रिक्‍शे की सवारी नहीं की। वे कहते थे – ‘एक आदमी दूसरे आदमी को खींचे, यह अमानवीय है।’ डॉ. लोहिया ने एक बार कहा था – ‘जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं’। उनका यह सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है। उनकी जयंती पर प्रस्‍तुत है धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी का आलेख –

डॉ. राम मनोहर लोहिया देश के उस स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का नाम है, जो एक नई सोच और प्रगतिशील विचारधारा के मालिक थे। उन्‍होंने हमेशा सत्य का अनुकरण किया। भारत की राजनीति में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और उसके बाद ऐसे कई नेता आए जिन्होंने अपने दम पर राजनीति का रुख़ बदल दिया, उन्‍हीं में से एक थे राममनोहर लोहिया। वे अपनी प्रखर देशभक्ति और तेजस्‍वी समाजवादी विचारों के लिए जाने गए और इन्‍हीं गुणों के कारण अपने समर्थकों के साथ-साथ उन्होंने विरोधियों से भी बहुत सम्‍मान हासिल किया।

युवावस्‍था में ही आंदोलनों से जुड़े

राम मनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च, 1910 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले (अब अम्‍बेडकरनगर) के अकबरपुर में हुआ था। उनकी मां शिक्षिका थीं। उन्‍हें अपने पिता से युवा अवस्था में ही विभिन्न रैलियों और विरोध सभाओं के माध्यम से भारत के स्वतंत्रता आंदोलनों में भाग लेने की प्रेरणा मिली। उनके जीवन में नया मोड़ तब आया, जब एक बार उनके पिता महात्‍मा गांधी से मिलाने के लिए राम मनोहर को अपने साथ लेकर गए। उनके पिता महात्मा गांधी के घनिष्ठ अनुयायी थे। गांधी जी के व्यक्तित्व और सोच से राम मनोहर बहुत प्रेरित हुए तथा जीवनपर्यन्त गांधी जी के आदर्शों का समर्थन किया। वह 10 साल की उम्र में ही गांधी जी के सत्‍याग्रह से जुड़ गए थे।

नेहरू से अलग थी विचारधारा

साल 1921 में राम मनोहर लोहिया पहली बार पंडित जवाहर लाल नेहरू से मिले थे और कुछ सालों तक उनकी देखरेख में कार्य करते रहे। लेकिन बाद में उन दोनों के बीच विभिन्न मुद्दों और राजनीतिक सिद्धांतों को लेकर टकराव हो गया। 18 साल की उम्र में वर्ष 1928 में युवा लोहिया ने ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित ‘साइमन कमीशन’ के विरोध में प्रदर्शन किया।

पहली बार 1939 में हुए गिरफ्तार

24 मई, 1939 को लोहिया को उत्तेजक बयान देने और देशवासियों से सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार करने के लिए कहने पर पहली बार गिरफ्तार किया गया, लेकिन युवाओं के विद्रोह के डर से उन्हें अगले ही दिन रिहा कर दिया गया। हालांकि जून 1940 में उन्हें ‘सत्याग्रह नाउ’ नामक लेख लिखने के आरोप में दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया और दो वर्षों के लिए कारावास भेज दिया गया। बाद में उन्हें दिसम्बर, 1941 में जेल से रिहा किया गया।

भारत छोड़ो आंदोलन

भारत छोड़ो आंदोलन ने लोहिया को परिपक्‍व नेता बना दिया। 9 अगस्त, 1942 को जब गांधी जी और अन्य कांग्रेस नेता गिरफ्तार कर लिए गए, तब लोहिया ने भूमिगत रहकर ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ को पूरे देश में फैलाया। भूमिगत रहते हुए उन्होंने तब ‘जंग जू आगे बढ़ो, क्रांति की तैयारी करो’, ‘आजाद राज्य कैसे बने’ जैसी पुस्तिकाएं लिखीं। 20 मई, 1944 को लोहिया जी को मुंबई में गिरफ्तार करके एक अंधेरी कोठरी में रखा गया। इस दौरान लोहिया को पुलिस की ओर से काफी यातनाएं दी गईं।

भारत के विभाजन का विरोध

जब भारत स्वतंत्र होने के करीब था तो उन्होंने दृढ़ता से अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से देश के विभाजन का विरोध किया था। वे देश का विभाजन हिंसा से करने के खिलाफ थे। आजादी के दिन जब सभी नेता 15 अगस्त, 1947 को दिल्ली में इकट्ठे हुए थे, उस समय वे भारत के अवांछित विभाजन के प्रभाव के शोक की वजह से अपने गुरु के साथ दिल्ली से बाहर थे। आजादी के बाद भी वे राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में ही अपना योगदान देते रहे। उन्होंने आम जनता और निजी भागीदारों से अपील की कि वे कुओं, नहरों और सड़कों का निर्माण कर राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए योगदान में भाग लें।

जात-पात के घोर विरोधी और हिन्‍दी के समर्थक

लोहिया जी ने हमेशा भारत की आधिकारिक भाषा के रूप में अंग्रेजी से अधिक हिंदी को प्राथमिकता दी। उनका विश्वास था कि अंग्रेजी शिक्षित और अशिक्षित जनता के बीच दूरी पैदा करती है। वे कहते थे कि हिन्दी के उपयोग से एकता की भावना और नए राष्ट्र के निर्माण से सम्बन्धित विचारों को बढ़ावा मिलेगा। वे जात-पात के घोर विरोधी थे। उन्होंने जाति व्यवस्था के विरोध में सुझाव दिया कि ‘रोटी और बेटी’ के माध्यम से इसे समाप्त किया जा सकता है। वे कहते थे कि सभी जाति के लोग एक साथ मिल-जुलकर खाना खाएं और उच्च वर्ग के लोग निम्न जाति की लड़कियों से अपने बच्चों की शादी करें। इसी प्रकार उन्होंने अपने ‘यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी’ में उच्च पदों के लिए हुए चुनाव के टिकट निम्न जाति के उम्मीदवारों को दिया और उन्हें प्रोत्साहन भी दिया। वे ये भी चाहते थे कि बेहतर सरकारी स्कूलों की स्थापना हो, जो सभी को शिक्षा के समान अवसर प्रदान कर सकें।

1948 में हो गए कांग्रेस से अलग

लोहिया ने वर्ष 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की आधारशिला रखी थी। वर्ष 1936 में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का पहला सचिव नियुक्त किया। देश को आजादी मिलने के बाद मार्च, 1948 में नासिक सम्मेलन में सोशलिस्ट दल ने कांग्रेस से अलग होने का निश्चय किया। लोहिया जी ने कृषि से सम्बंधित समस्याओं के आपसी निपटारे के लिए ‘हिन्द किसान पंचायत’ का गठन किया।

रखी समाजवाद की नींव

लोहिया ने स्वतंत्रता के नाम पर सत्ता मोह का खुला खेल अपनी नंगी आंखों से देखा था और इसीलिए स्वतंत्रता के बाद की कांग्रेस पार्टी और कांग्रेसियों के प्रति उनमें बहुत नाराजगी थी। लोहिया सही मायनों में गैर-कांग्रेसवाद के शिल्पी थे। भारत विभाजन में कांग्रेस के विचारों ने उन्हें बहुत ठेस पंहुचाई, जिसके बाद उन्होंने कांग्रेस से दूरी बनाते हुए समाजवाद को अपना ध्येय बना लिया। लोहिया ने कहा, ‘हिंदुस्तान की राजनीति में तब सफाई और भलाई आएगी, जब किसी पार्टी के खराब काम की निंदा उसी पार्टी के लोग करें और मैं यह याद दिला दूं कि मुझे यह कहने का हक है कि हम ही हिंदुस्तान में एक राजनीतिक पार्टी हैं जिन्होंने अपनी सरकार की भी निंदा की थी और सिर्फ निंदा ही नहीं की बल्कि एक मायने में उसको इतना तंग किया कि उसे हट जाना पड़ा।’

व्‍यवस्‍था परिवर्तन के हिमायती

लोहिया व्यवस्था परिवर्तन के हिमायती थे। वे समाज के निचले पायदान पर रह गए वंचितों की गैर-बराबरी के खात्मे के हिमायती थे। यही नहीं, मानव के द्वारा मानव के शोषण की मुखालफत करने में भी लोहिया ने कोई कसर नहीं रखी। उन्होंने आगे चलकर विश्व विकास परिषद बनाई। जीवन के अंतिम वर्षों में वे राजनीति के अलावा साहित्य से लेकर कला तक पर युवाओं से संवाद करते रहे। 12 अक्तूबर, 1967 को लोहिया 57 वर्ष की अवस्‍था में उनका दिल्‍ली में निधन हुआ।

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