नवरात्रि के चौथे दिन करें मां कूष्माण्डा की पूजा, दूर होते हैं रोग

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बुधवार (21 मार्च) को नवरात्रि का चौथा दिन है। इस दिन मां कूष्माण्डा की पूजा-अर्चना की जाती है। ये नवदुर्गा का चौथा स्वरूप हैं। अपनी हल्की हंसी से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इनका नाम कूष्माण्डा पड़ा। ये अनाहत चक्र को नियंत्रित करती हैं। मां कूष्‍माण्‍डा की आठ भुजाएं हैं इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहते हैं। माता अपने हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृत से भरा कलश, गदा, चक्र और जपमाला धारण करती हैं। मां कूष्‍माण्‍डा का वाहन सिंह है।

आदिशक्ति हैं मां कूष्माण्डा

संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा को कुम्हड़ कहते हैं और मां कुष्माण्डा को कुम्हड़ा विशेष रूप से प्रिय है। ज्योतिष में मां कूष्माण्डा का संबंध बुध ग्रह से है। देवी कूष्‍माण्‍डा को देवी भागवत् पुराण में आदिशक्ति के रूप में बताया गया है। मां कूष्‍माण्‍डा की उपासना से भक्तों के कई तरह के रोग मिट जाते हैं। मां की उपासना से आयु, यश और बल बढ़ता है।

मां कूष्माण्डा ने की थी ब्रह्मांड की रचना

ऐसी मान्यता है जब सृष्टि का कोई नामोनिशान नहीं था, तब देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। देवी पुराण में बताया गया है कि सृष्टि के आरंभ से पहले अंधकार का साम्राज्य था। उस समय आदि शक्ति जगदम्बा देवी कूष्माण्डा के रूप में वनस्पतियों एवं सृष्टि की रचना के लिए जरूरी चीजों को संभालकर सूर्य मण्डल के बीच में विराजमान हो गई थीं।
नवरात्रि के चौथे दिन बड़े माथे वाली विवाहित महिला का पूजन करना चाहिए। माता को फल, मेवे और सौभाग्य का सामान भेंट करना चाहिए।

मां कूष्मांडा की कृपा पाने के लिए नवरात्रि के चौथे दिन इस मंत्र का जाप करना चाहिए।

या देवि सर्वभूतेषु  सृष्टि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

पूजा की विधि

माता कूष्माण्डा के दिव्य रूप को मालपुए का भोग लगाकर किसी भी दुर्गा मंदिर में ब्राह्मणों को इसका प्रसाद देना चाहिए। इससे माता की कृपा स्वरूप उनके भक्तों को ज्ञान की प्राप्ति होती है, बुद्धि और कौशल का विकास होता है। देवी को लाल वस्त्र, लाल पुष्प, लाल चूड़ी भी अर्पित करना चाहिए।

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