मदरसों में सरकारी दखल: दारुल उलूम बोला- न लें किसी तरह की मदद

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सहारनपुर। नामचीन इस्लामिक सेंटर दारुल उलूम देवबंद से यूं तो तमाम फतवे जारी होते हैं, लेकिन इस बार उसने कहा है कि मदरसे किसी भी सूरत में सरकार से मदद न लें। इस्लामिक सेंटर का मानना है कि सरकार मदद देती है, तो वो मदरसों के कामकाज में गैरजरूरी दखल भी देती है।

दारुल उलूम के कितने मदरसे
दारुल उलूम देवबंद के देशभर में करीब तीन हजार मदरसे हैं। इनमें से ज्यादातर सरकारी मदद से चलते हैं। सरकारी मदद से मदरसों के टीचरों को तनख्वाह मिलती है। दारुल उलूम के मुताबिक टीचरों को अब आम लोगों के दान से मिले पैसों से सैलरी दी जाएगी।

राबता-ए-मदारिस ने लिया फैसला
मदरसों का प्रबंधन देखने के लिए दारुल उलूम में कार्यकारी समिति है। इसे राबता-ए-मदारिस कहा जाता है। समिति में दारुल उलूम की सबसे बड़ी फैसले लेने वाली कार्यकारी समिति शूरा के 10 सदस्य हैं। इनके अलावा 10 वरिष्ठ टीचर यानी उस्ताद और मदरसों के 31 प्रतिनिधि भी इसमें हैं।

और क्या लिए फैसले ?
राबता-ए-मदारिस ने मदरसों से ये भी कहा है कि वो अपनी प्रॉपर्टी के ताजा रिकॉर्ड रखें। साथ ही गैर मुस्लिमों से भी भाईचारा बढ़ाएं। गैर मुस्लिमों को त्योहारों पर मदरसों में आमंत्रित भी करने का निर्देश दिया गया है। दारुल उलूम के मोहतमिम यानी प्रमुख अबुल कासिम नोमानी के मुताबिक मदरसों को सरकारी मदद से न चलाने की बात पहले से तय थी।

क्या कहते हैं मोहतमिम ?
मोहतमिम नोमानी का कहना है कि जब कोई मदरसा सरकारी मदद लेता है, तो उसे सरकार की दूसरे स्कूलों के लिए लागू नीतियों को मानना होता है। जबकि मदरसों में अनुशासन अलग होता है, यूनिफॉर्म अलग होती है और सिलेबस भी बाकी स्कूलों से अलग होता है। हम नहीं चाहते कि सरकार हमारे कामकाज में किसी तरह की दखलंदाजी करे।

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