पेंसिल पकड़ने में कमजोर हो रही है टचस्क्रीन जेनरेशन

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  • अगर आपके बच्चे को भी है स्‍मार्टफोन की लत, तो हो जाएं सावधान
  • टचस्क्रीन फोन के ज्‍यादा इस्तेमाल से एक्टिविटी से दूर हो रहे हैं बच्चे

बाजार में आ रहे तरह-तरह के स्‍मार्टफोन और टैबलेट हमारी जिंदगी का इस कदर हिस्‍सा बन चुके हैं कि यदि थोड़ी देर के लिए भी हम इनसे दूर हो जाएं तो लगता है कहीं कुछ खो गया है। स्‍मार्टफोन आज हमारी आदत में शुमार हो गया है। बड़े तो बड़े, अब छोटे बच्‍चे भी (भले ही स्‍कूल जाने की उनकी उम्र न हो) इससे अछूते नहीं हैं। कई बार अभिभावक भी बच्‍चों को बहलाने के लिए उन्‍हें मोबाइल थमा देते हैं। लेकिन शायद आपको पता नहीं, टचस्‍क्रीन वाले स्‍मार्टफोन छोटे बच्‍चों को बहुत नुकसान पहुंचा रहे हैं। इंग्‍लैंड में हुए एक ताजा अध्‍ययन में पता चला है कि टचस्‍क्रीन मोबाइल के ज्‍यादा इस्‍तेमाल से बच्‍चों को पेंसिल या पेन पकड़ने में समस्‍या आ रही है। प्रस्‍तुत है धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी की रिपोर्ट –

आज हम बच्‍चों को देखते हैं तो लगता है कि उनका खिलंदड़पन, उनकी मासूमियत, उनका बचपन कहीं खो गया है। वे घर में खेले जाने वाले परंपरागत खेलों और आउटडोर गेम्‍स से दूर होते जा रहे हैं। इसकी जगह ले ली है स्‍मार्टफोन ने। मोबाइल फोन अब उनके लिए खिलौना बन गया है। अब बच्चे छोटी उम्र में ही मोबाइल, टैबलेट या अन्य गैजेट्स के संपर्क में आ जाते हैं। एक रिसर्च के अनुसार, आज 2 साल से कम उम्र के 58% बच्‍चे मोबाइल से खेलते हैं। क्‍या आपने सोचा है कि टचस्‍क्रीन वाले मोबाइल आपके बच्‍चों के लिए कितनी बड़ी समस्‍या खड़ी कर सकते हैं?

उंगलियों की मांसपेशियां हो रहीं प्रभावित

इंग्लैंड के नेशनल हैंडराइटिंग एसोसिएशन की एक रिसर्च के नतीजे बताते हैं कि बच्‍चों के लिए टचस्क्रीन फोन बहुत नुकसानदायक हैं। इसके ज्‍यादा इस्‍तेमाल से उनके उंगलियों की मांसपेशियां प्रभावित होती हैं और इससे फंडामेंटल मूवमेंट्स  में कमी आती है। इसके कारण उन्‍हें पेन और पेंसिल पकड़ने और उस पर ग्रिप बनाने में मुश्किल आ रही है। इसका पता हमें तब चलता है, जब बच्‍चे 2-3 साल की उम्र में स्‍कूल जाना शुरू करते हैं। वहां पेंसिल पर उनकी ग्रिप ही नहीं बनती। इसका विपरीत प्रभाव यह हो रहा है कि बच्‍चे अब देर से लिखना शुरू कर रहे हैं और उनकी हैंडराइटिंग पर भी इसका सीधा असर पड़ रहा है। यही नहीं, उन्‍हें ड्राइंग बनाने में भी समस्‍या आती है।

पेंसिल पकड़ने का सही तरीका

शोधकर्ताओं का कहना है कि बच्चे अगर हाथ की पहली उंगली और अंगूठे से पेंसिल पकड़ रहे हैं तो यह सही तरीका है। पेंसिल या पेन पकड़ने की इस पोजीशन को ‘डायनैमिक ट्राइपॉड’ कहते हैं। इसके अलावा बच्‍चे अगर अन्‍य किसी तरीके से पेंसिल पकड़ रहे हैं तो इसका मतलब है कि उनकी इंडेक्स फिंगर (हाथ की पहली उंगली) की मांसपेशियां कमजोर हैं।

लंदन में सामने आया अनूठा केस

रिसर्च में लंदन के छह साल के बच्चे पैट्रिक का अनूठा केस सामने आया। पैट्रिक का पिछले साल स्कूल में दाखिला हुआ तो उसे पेंसिल पकड़ने में समस्या आती थी। ज्यादा देर तक पेंसिल पकड़ने पर पैट्रिक के हाथ में सूजन आ जाती थी। मां-बाप ने डॉक्टर को दिखाया तो पता चला कि पैट्रिक टचस्क्रीन जेनरेशन के इस सिंड्रोम से पीड़ित है। अब पैट्रिक की फिजियोथेरेपी हो रही है। उसे हर हफ्ते दो बार थेरेपी के लिए जाना पड़ता है और यह थेरेपी छह महीने तक चलेगी।

चेते नहीं, तो बच्चे लिखने की बजाय टाइप करना ही जानेंगे : डॉ. मनोज सिंह 

डॉ. मनोज सिंह

लखनऊ के अलीगंज में निजी प्रैक्टिस करने वाले चाइल्‍ड स्‍पेशलिस्‍ट डॉ. मनोज सिंह कहते हैं – मस्तिष्क के बाद अगर कोई और योग्यता मनुष्य को जानवर से ऊपर रखती है तो वो है हाथों की पकड़। मानव आरम्भ में हथियार, फिर औज़ार और आगे चलकर क़लम के द्वारा ही इतना विकसित हो सका है। हमारे हाथों की पकड़ (Grasp) का विकास जीवन के प्रथम वर्ष में ही सर्वाधिक होता है। पहले कुछ महीनों में बच्चे अपनी हथेली और चारों उंगलियों के बीच चीजें पकड़ते हैं (Ulnar Grasp), फिर एक वर्ष की आयु में बच्चे अंगूठे और तर्जनी के बीच खिलौने पकड़ने लगते हैं (Pincer Grasp)।

सबसे बारीक़ पकड़ आती है 4 से 6 वर्ष में जब बच्चे अंगूठे, तर्जनी और मध्यमा के बीच कलम पकड़ने लगते हैं (Tripod Grasp)। ये पकड़ ही बच्चों को सुन्दर लिखावट के योग्य बनाती है। झुनझुने, गेंद, छल्ले, क्ले पकड़ के इस क्रमिक विकास में सहायक होते हैं। पर अफ़सोस कि आज के युग में इन सबका स्थान मोबाइल फोन ने ले लिया है जिससे केवल Ulnar Grasp का ही विकास होता है, Pincer grasp और Tripod Grasp विकसित नहीं हो पाती हैं। अगर हम अभिवावक अभी न चेते तो वो दिन दूर नहीं जब बच्चे लिखने की बजाय टाइप करना ही जानेंगे।

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