लोकसभा उपचुनाव 11 को, गोरखपुर-फूलपुर में आसान नहीं बीजेपी की राह

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लखनऊ। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के संसदीय क्षेत्र गोरखपुर और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के फूलपुर में रविवार को लोकसभा उप चुनाव होने जा रहे हैं। दोनों ही सीटों पर 2014 में बीजेपी ने परचम लहराया था, लेकिन इस बार बीजेपी के लिए दोनों सीटें जीतना लोहे के चने चबाने जैसा हो सकता है। वजह ये कि लोकसभा चुनाव में अलग-अलग लड़ी सपा और बसपा इस बार एक हैं। ऐसे में दोनों दलों के वोटरों की संख्या बीजेपी के वोटरों की संख्या पर भारी पड़ सकती है।

क्या है गोरखपुर का गणित ?
गोरखपुर लोकसभा सीट में पांच विधानसभा सीटें गोरखपुर सदर, गोरखपुर ग्रामीण, पिपराइच, कैंपियरगंज और सहजनवा शामिल हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में पांचों सीटें बीजेपी जीती थी। तब उसे 4 लाख 52 हजार 495 वोट मिले थे, जबकि सपा और बसपा के वोटों को मिला दें तो ये 5 लाख 25 हजार 126 होते हैं। गोरखपुर से बीजेपी के उपेंद्र दत्त शुक्ल मैदान में हैं, जबकि सपा के उम्मीदवार प्रवीण निषाद हैं। उन्हें बीएसपी का समर्थन हासिल है।

फूलपुर में अतीक पहुंचाएगा बीजेपी को फायदा ?
वहीं, इलाहाबाद की फूलपुर लोकसभा सीट पर भी बीजेपी को दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। इसके अंतर्गत फूलपुर, इलाहाबाद उत्तरी, इलाहाबाद पश्चिमी, फाफामऊ और सोरांव विधानसभा सीटें आती हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में इन पांचों सीटों पर कुल मिलाकर बीजेपी को 4 लाख 29 हजार 674 वोट हासिल हुए थे, जबकि सपा और बीएसपी के कुल वोटों को जोड़ें तो ये 4 लाख 65 हजार 450 होते हैं। केशव प्रसाद मौर्या के सीट खाली करने के बाद बीजेपी ने इस बार यहां से कौशलेंद्र सिंह पटेल को टिकट दिया है। वो वाराणसी के मेयर भी रह चुके हैं, जबकि सपा और बीएसपी के साझा उम्मीदवार नागेंद्र सिंह पटेल हैं। वो सपा के मंडल अध्यक्ष हैं। खास बात ये है कि माफिया सरगना और सपा का सांसद रह चुका अतीक अहमद यहां से बतौर निर्दलीय चुनाव मैदान में है। वो सपा के वोट काट सकता है और इससे बीजेपी को फायदा पहुंचने की उम्मीद है।

नतीजों पर रहेगी नजर
दोनों लोकसभा सीटों पर रविवार यानी 11 मार्च को वोट पड़ेंगे, जबकि 14 मार्च को वोटों की गिनती होगी। अगर बीजेपी दोनों सीटों को फिर से हासिल कर लेती है, तो ये सपा और बीएसपी के लिए सबसे बड़ा झटका साबित होगा। वहीं, बीजेपी से दोनों सीटें अगर विपक्ष ने झटक लीं, तो 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले यूपी में विपक्षी एकता की नई जमीन तैयार हो सकती है।

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