‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ में अब टेराकोटा शिल्प को भी मिलेगा बढ़ावा

84 0
  • मुख्यमंत्री के जिले गोरखपुर के शिल्‍पग्राम औरंगाबाद के मेहनतकशों में जगी उम्मीद
  • प्रदेश में ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ परियोजना के लिए बजट में 750 करोड़ का प्रावधान

गोरखपुर। प्रदेश सरकार के बजट में ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ परियोजना के लिए बजट में धन का प्रावधान होने से पूर्वांचल से विलुप्त होती जा रही यहां की लाल मिट्टी से बनने वाली अनोखी कला ‘टेराकोटा’ के कामगारों में एक नई उम्मीद जगी है। मिट्टी की कलाकृतियों के इन मेहनतकशों को उसके कद्रदान मिल सकेंगे। प्रदेश में ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ परियोजना के लिए बजट में करीब 750 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

गोरखपुर के औरंगाबाद गांव में टेराकोटा की कलाकृतियां बनाते शिल्पकार

यहां के कामगारों के हाथों में जीवंत हो उठती है मिट्टी

गोरखपुर से लगभग 16 किमी दूर स्थित औरंगाबाद गांव की मिट्टी बोलती है, सुनती है और अपने कला के पुजारियों के हाथों जीवंत हो उठती है। यह गांव सदियों से अपनी इस अनोखी कला के लिए जाना जाता है। इस कला के कद्रदानों की कोई कमी नहीं है। देश ही नहीं, विदेशों में भी इस कला की खूब मांग है। बता दें कि टेराकोटा की कला ने कई कुम्हारों को प्रदेश सरकारों से सम्मान भी दिलाया है।

टेराकोटा कलाकार बताते हैं कि इसके कद्रदान इसकी कीमत समझते हैं लेकिन मांग कम हो गई थी। कलाकार उम्मीद जताते हैं कि अगर सरकारी प्रोत्साहन मिला और देशी सामानों पर फोकस किया गया तो उनके भी दिन बहुरेंगे। ये लोग बताते हैं कि मिट्टी की ये कलाकृतियां बहुत ही मेहनत से बनती हैं और ये बहुत आकर्षक होती हैं। सबसे बड़ी बात यह प्रदूषण मुक्त होता है लेकिन फिर भी यह उद्योग आधुनिकता की मार सहने को मजबूर है। सबसे अधिक नुकसान चीन निर्मित सामानों से हुआ।

आज भी जीवित रखी है पुश्तैनी कला
कलाकार बताते हैं कि हम मिट्टी से गणेश, लक्ष्मी, डिजाइनर दीया, कोकोनट लाइट, झूमर, हाथी, घोड़ा, ऊंट, जिराफ, डिजाइनर फ्लावर स्टैण्ड सहित दर्जनों सामान हाथों से बनाते हैं। इन्हें बनाने में किसी भी तरह की डाई और मशीनों का उपयोग नहीं किया जाता। एक कलाकृति को बनाने में कई-कई घण्टे लगते हैं। इन सबके बावजूद हमारी मेहनत के हिसाब से कमाई नहीं हो पाती। फिर भी हम अपनी इस पुश्तैनी कला को जिन्दा रखे हुए हैं। प्रदेश सरकार द्वारा ‘एक जनपद-एक उत्पाद’ योजना में टेराकोटा शिल्प के चुने जाने से औरंगाबाद गांव के गीली मिट्टी से खेलने वालों का उत्साह और बढ़ गया है।

अब मिल सकेगी इनके मेहनत की कमाई
देश दुनिया में औरंगाबाद की शिल्प कला के कद्रदान तो बहुतेरे हैं लेकिन सरकारों द्वारा प्रोत्साहन की कमी से इनको इनकी मेहनत की उचित कीमत नहीं मिलती थी । मुंबई, दिल्ली सहित विदेशों में इन कलाकृतियों की मांग होने के बावजूद यहां के लोगों को लाभ कम ही मिल पा रहा था। अब शायद इन लोगों को इनकी मेहनत की उचित कीमत मिल सके।

Related Post

बेगूसराय में कार्तिक पूर्णिमा स्नान के दौरान भगदड़, 4 की मौत

Posted by - November 4, 2017 0
सिमरिया घाट पर स्नान के लिए बड़ी संख्या में जुटे थे श्रद्धालु, एक दर्जन से अधिक घायल  बेगूसराय  : बिहार के बेगूसराय…

जानते हैं, महाभारत युद्ध के दौरान लाखों सैनिकों के लिए कौन बनाता था भोजन

Posted by - August 2, 2018 0
उडुपी। कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत का युद्ध होने वाला था। दोनों अपने-अपने पक्ष में राजाओं को ला रहे…

मोदी के गुजरात दौरे पर राहुल ने बताया ‘मौसम का हाल’, कहा- आज होगी जुमलों की बारिश

Posted by - October 16, 2017 0
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज एक बार फिर गुजरात दौरे पर जा रहे हैं. उम्मीद जताई जा रही है कि पीएम…

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *