कुशल कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा भारत

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दुनियाभर के तमाम ऐसे देश हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था कौशल की कमी की वजह से चरमरा रही है। ग्लोबलाइजेशन और तकनीकी परिवर्तनों ने जॉब मार्केट की तस्‍वीर पूरी तरह बदलकर रख दी है। इस लिहाज से दुनियाभर के देशों में ऐसे लोगों की जरूरत महसूस की जा रही है जो पूरी तरह से कुशल हों। इन देशों में कौशल की कमी से अच्‍छे लोग मिलना भी मुश्किल होता जा रहा है। प्रस्‍तुत है स्‍मृति की रिपोर्ट –

 देखा जाए तो कौशल की कमी से दुनिया के सभी देश जूझ रहे हैं, लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों में नजर आ रहा है। ओईसीडी की रिपोर्ट की मानें तो 10 देशों में से भारत दूसरे नंबर पर है जिसे सबसे ज्‍यादा कौशल की कमी की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। भारत की 64 प्रतिशत फर्मों को अपने यहां काम करने के लिए योग्य कर्मचारी खोजे नहीं मिल रहे हैं। इन फर्मों को कुशल कर्मचारियों की तलाश पूरी न होने की वजह से समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में हर साल 90 लाख युवा ग्रेजुएशन पूरा करते हैं, लेकिन उनका लक्ष्‍य सरकारी नौकरी में जाना होता है। इन युवाओं के इस रूझान की वजह से देश की जीडीपी (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट) पर असर पड़ रहा है।

वर्तमान में भारत समृद्ध उद्योगों का केंद्र है और विनिर्माण, खनन निर्माण, मैकेनिकल इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रानिक्स, सूचना प्रौद्योगिकी के जैसे तमाम क्षेत्रों में खासा विकास कर रहा है। त्वरित आर्थिक विकास ने कुशल श्रम शक्ति की मांग को भी बढ़ा दिया है। इसकी वजह से देश में कुशल श्रमिकों की कमी भी उजागर हो गई है। लोग नौकरी के लिए बहुत दूरदराज के क्षेत्रों में नहीं जाना चाहते और यदि जाते भी हैं तो अधिक वेतन की डिमांड करते हैं। यह भी एक बड़ा कारण है कि कंपनियां ऐसे लोगों को नौकरी देने में असमर्थता जताती हैं।

कई देशों में हुए सर्वे से पता चलता है कि भारत एक ऐसा देश है जहां कौशल की कमी की वजह से एम्प्लायर को कर्मचारी तलाशने में सबसे ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन, जबसे भारत ने तमाम क्षेत्रों में अवसर खोले हैं, उसके बाद से स्थानीय स्तर पर कुशल लोगों की उपलब्‍धता पूरी नहीं हो पा रही है। इसे देखते हुए अंतरराष्ट्रीय छात्रों को बाजार में छाने और बड़े ओहदे पाने का मौका मिल रहा है। भारत सरकार ने भी हालात को देखते हुए भारतीय युवाओं के कौशल को निखारने की दिशा में कदम उठाया है। सरकार ने युवाओं को कुशल बनाने के लिए तमाम योजनाएं शुरू की हैं। दुनियाभर के तमाम लोग इसका फायदा उठा रहे हैं।

राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (एनएसडीसी) के मुताबिक, पीपीपी (public-private partnership ) प्रोजेक्‍ट के तहत कौशल विकास कार्यक्रमों के जरिए आने वाले दशक में लगभग 12.8 मिलियन लोग हर साल नौकरी के लिए तैयार होंगे। देश के युवाओं को गुणवत्तापूर्ण कौशल प्रशिक्षण देने में सरकार के सामने कई चुनौतियां आती हैं। मसलन –

  • गुणवत्ता और प्रासंगिकता बनाए रखना
  • सरकार चाहती है कि स्कूल की पढ़ाई और कौशल विकास साथ में किया जाए, लेकिन येमुमकिन नहीं हो पा रहा है
  • भारत के जो इंस्टीट्यूट हैं, उनमें कौशल विकास का प्रावधान होना चाहिए
  • कौशल विकास के वित्तपोषण के लिए पर्याप्त निवेश की व्‍यवस्‍था होनी चाहिए.

संयुक्त राष्ट्र की वर्ष 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिमी देशों की तुलना में भारत सबसे ज्यादा यूथ की आबादी वाला देश है। दूसरी तरफ दुनिया के दूसरे देशों में अधिक उम्र वाले लोगों की संख्‍या ज्‍यादा है। भारत के पास यह प्लस पॉइंट जरूर है कि हमारे यहां यूथ की संख्या ज्यादा है, लेकिन कौशल की कमी के कारण देश इसका अपेक्षित लाभ नहीं उठा पाता है।

भारत में औपचारिक और अनौपचारिक दोनों ही मध्यम से युवा कौशल प्राप्त करते हैं। सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है। औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण में कौशल विकास के कुछ ऐसे स्रोत हैं जो सरकार द्वारा संचालित हैं, जैसे औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई), निजी प्रशिक्षण केंद्र (आईटीसी), व्यावसायिक स्कूल, तकनीकी प्रशिक्षण के लिए विशिष्ट संस्थान और उद्योग द्वारा प्रशिक्षण इनमें शामिल हैं।

हाल ही में प्राइवेट सेक्टर में कौशल विकास की भागीदारी में इजाफा हुआ है, लेकिन अब भी कौशल विकास में प्राइवेट सेक्टर के मुकाबले सरकारी सेक्टर का ज्यादा प्रभुत्व है।

भारत में लगभग 12 मिलियन लोग ऐसे हैं, जो हर साल कोई न कोई नौकरी ज्वाइन करते हैं। इनमें तीन कैटेगरी के लोग होते हैं – बहुत ज्यादा कुशल,  थोड़ा कुशल और बिल्कुल कुशल नहीं। इनमें बड़ी संख्‍या ऐसे लोगों की है जो बिल्‍कुल भी कुशल नहीं है।

सरकार को लगता है कि शिक्षा और कौशल विकास के जरिए मानव शक्ति का निर्माण कर देश के आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया जा सकता है। देश में कौशल भारत कार्यक्रम 15 जुलाई, 2015 को शुरू किया गया था, साथ ही कौशल विकास और उद्यमिता के लिए नई राष्ट्रीय नीति की भी घोषणा की गई थी। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) इस उद्देश्‍य के साथ शुरू की गई थी कि इसके जरिए एक साल में 20 लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया जाए। एनएसडीसी ने 2014-15 में 13 लाख लोगों को प्रशिक्षित किया था। इस मिशन के तहत 2022 तक 150 मिलियन लोगों को प्रशिक्षित करने के लक्ष्य को अब बढ़ाकर 400 मिलियन कर दिया गया है।

हालांकि भारत में सबसे बड़ी कामकाजी आबादी है और इस आबादी का कौशल देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्‍हें और अधिक ऊर्जावान बनाने के लिए यह जरूरी है कि उन्हें पर्याप्त और गुणवत्‍तापरक कौशल प्रशिक्षण दिया जाए। भारत का लक्ष्य 21वीं सदी में दुनिया की सबसे मजबूत आर्थिक शक्तियों में शामिल होना है, इसलिए देश के लिए बढ़ते कर्मचारियों की मांग के मद्देनजर अकुशल श्रम की समस्या से निपटने के लिए और भी ठोस पहल करनी होगी।

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