हर जिले में ट्रॉमा सेंटर अभी दूर की कौड़ी

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  • सुप्रीम कोर्ट का आदेश लागू करने से पहले स्‍वास्‍थ्‍य महकमे की ओवरहालिंग जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों आदेश दिया था कि सभी जिलों में ट्रॉमा सेंटर की स्‍थापना की जाए। इस आदेश के बाद स्‍वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्‍या बिहार और उत्‍तर प्रदेश जैसे राज्‍यों में ट्रॉमा सेंटर खोलने के लिए आधारभूत संरचनाएं मौजूद हैं ? यूपी में अभी ये हाल है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित प्राथमिक और सामुदायिक स्‍वास्‍थ्‍य केंद्रों में कोई डॉक्‍टर जाना ही नहीं चाहता। जिला अस्‍पतालों का हाल भी किसी से छिपा नहीं है। ना तो इन अस्‍पतालों में पर्याप्‍त सुविधाएं हैं और न ही डॉक्‍टर और पैरामेडिकल स्‍टाफ। प्रस्‍तुत है स्‍मृति की रिपोर्ट –   

सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों के मामले में भारत का दुनिया में पहला स्‍थान है। वर्तमान में सड़क हादसों और उनमें होने वाली मौतों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। सड़क दुर्घटनाओं में मरने वाले लोगों में ज्यादातर युवा होते हैं। एनसीआरबी और सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर मिनट एक गंभीर सड़क दुर्घटना होती है और हर घंटे सड़क हादसों में लगभग 16 लोग मारे जाते हैं। वहीं सड़क दुर्घटनाओं की वजह से अकेले उत्तर प्रदेश में हर दिन लगभग 60 लोग घायल होते हैं और 80 लोगों की मौत हो जाती है। आज भी अस्‍पतालों में उचित संसाधन और सही इलाज की व्‍यवस्‍था न होने से कई जिंदगियां खत्‍म हो जाती हैं। अगर अस्पतालों में आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए अच्छी व्यवस्था हो तो इन जिंदगियों को बचाया जा सकता है।

स्रोत : एनसीआरबी रिपोर्ट 2015

2016 तक भारत में कुल जिलों की संख्या लगभग 707 थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि देश में प्राथमिक और सामुदायिक स्‍वास्‍थ्‍य केंद्रों की संख्‍या कम नहीं है, लेकिन इनकी बदहाली का एक बड़ा कारण यहां डॉक्‍टरों की कमी है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 31 मार्च, 2015 तक देश में कुल 1,53,655 स्‍वास्‍थ्‍य उपकेंद्र, 25,308 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और 5396 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) कार्य कर रहे थे। हालांकि 2014-2015 के दौरान इन स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या में वृद्धि हुई है लेकिन ये अब भी देश की दिन पर दिन बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। सबसे बड़ी कमी जो देखने में आई, वह पेशेवर डॉक्‍टरों की है, सर्जन (83.4%), चिकित्सक (83.0%)।

ग्रामीण स्वास्थ्य (आरएचएस) के आंकड़ों ने पीएचसी में डॉक्टरों की कमी के बारे में एक बड़ा खुलासा किया है। इसके अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में कुल 3497 चिकित्‍सकों की आवश्‍यकता थी लेकिन मात्र 2209  चिकित्‍सक ही उपलब्‍ध थे।। ये आँकड़े बताते हैं कि सरकार इस मामले में कितनी लापरवाह है।

ग्रामीण स्वास्थ्य के आंकड़े (आरएचएस की रिपोर्ट)
एसजीपीजीआई, लखनऊ

लखनऊ शहर में हुए एक अध्‍ययन में पाया गया कि संजय गांधी पीजीआई के पास इमरजेंसी में एक भी मेडिकल ऑफिसर और आर्थोपेडियंस तैनात नहीं है और न ही इमरजेंसी ऑपरेशन थियेटर है। संस्थान का बस एक ही काम रह गया है कि वह मरीज की हालत देखकर सिर्फ ये बताता है कि उसकी स्थिति कितनी गंभीर है और उसे दूसरे हॉस्पिटल रेफर कर दे रहा है। पीजीआई की ये हालत देखकर अभी तक जो लोगों की जो धारणा है कि पीजीआई में जाने का मतलब अपना समय बरबाद करना है, वह सच होती नजर आ रही है। हाल ही में पीजीआई ने एक समिति गठित की है ताकि बेहतर इमरजेंसी सेवाएं शुरू की जा सकें। कुछ सरकारी अस्पतालों में भी छह बेड वाले ट्रॉमा सेंटर हैं, लेकिन वहां मरीज को देखने के लिए विशेषज्ञ डॉक्‍टर ही मौजूद नहीं हैं।

अस्पतालों में आने वाले मरीजों की संख्या बहुत अधिक है लेकिन उनके अनुपात में वहां मरीजों की देखभाल करने के लिए डॉक्टरों और अन्‍य पैरा मेडिकल स्‍टाफ की संख्या बहुत कम है। हम इसके लिए अस्पतालों को जिम्मेदार भी नहीं ठहरा सकते हैं क्योंकि वो पहले ही कई तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। एमबीबीएस कार्यक्रमों और नर्सिंग पाठ्यक्रमों में हाल ही में हुई वृद्धि के बावजूद भारत में कुशल डॉक्टरों और नर्सों की बेहद कमी है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अब भी अस्पतालों में नर्सिंग स्‍टाफ की 50% कमी  है। कायदे से ट्रॉमा सेंटर में चार रोगियों के लिए एक नर्स होनी चाहिए। इसके अलावा अस्पताल की साफ-सफाई और अन्‍य कार्यों के लिए 40%  और सहायक कर्मचारियों, वार्ड ब्‍वॉय और सफाई कर्मचारियों की जरूरत है, क्योंकि अस्पताल में आने वाले एक्‍सीडेंट के ज्यादातर मरीज गंभीर प्रकृति के होते हैं। उनके घाव खुले होते हैं और उनसे खून रिसता रहता है, जिससे दूसरे मरीजों को इन्फेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है। इसको देखते हुए सफाई कर्मचारियों की संख्या अधिक होनी चाहिए।

यही नहीं, नर्सिंग स्टाफ और अन्‍य पैरा मेडिकल स्‍टाफ की कमी के कारण अस्‍पतालों में बड़ी संख्‍या में तीमारदारों के आने-जाने पर भी रोक नहीं लग पाती है। बड़ी संख्‍या में तीमारदारों के आने-जाने से मरीजों के संक्रमित होने की आशंका होती है। इंटेसिव केयर यूनिट को छोड़कर, बाकी जगहों पर एक मरीज के साथ दो तीमारदार ही होने चाहिए। यही नहीं, रिसेप्‍शन पर भी कर्मचारियों के न होने के कारण मरीजों और उनके तीमारदारों को सही जानकारी नहीं मिल पाती और वे अस्‍पताल में यहां-वहां भटकते रहते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 30 नवंबर, 2017 को सड़क सुरक्षा पर कई निर्देश जारी किए थे और सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से प्रत्येक जिले में एक ट्रॉमा सेंटर स्थापित करने के लिए कहा था। साथ ही स्‍कूलों में पाठ्यक्रम के माध्‍यम से बच्‍चों को यातायात के नियमों का पालन करने के लिए जागरूक करने पर बल दिया था। कोर्ट ने सड़क सुरक्षा नियमों को तैयार करने के लिए सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए 31 मार्च,  2018 की समय सीमा निर्धारित की है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में सार्वजनिक वाहनों में ‘लोकेशन ट्रेकिंग डिवाइस’ लगाने को कहा है। साथ ही राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के यूनिवर्सल एक्‍सीडेंट हेल्पलाइन नंबर – 108 का अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार करने को भी कहा है, ताकि जब भी और जहां भी एम्बुलेंस की जरूरत हो वह मौके पर तुरंत पहुँच सके।

विश्व बैंक के सहयोग से मोरसेल रिसर्च एंड डेवलपमेंट की टीम द्वारा उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए एक परियोजना तैयार की गई है। इस परियोजना का उद्देश्य स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं की गुणवत्ता के बारे में लोगों को जागरूक करना है ताकि लोग खुद ही बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं की मांग कर सकें।

यह जरूरी है कि हमारे नीति निर्माताओं का लक्ष्य सिर्फ भारी-भरकम बजट वाले ट्रॉमा सेंटर की स्‍थापना ही नहीं हो, बल्कि ज्‍यादा जोर इन केंद्रों पर आने वाले गंभीर मरीजों के इलाज के लिए अस्पताल के मौजूदा बुनियादी ढांचे को सुधारना हो। इन केंद्रों पर एक्‍सरे, सीटी स्‍कैन, ब्‍लड जांच, खून चढ़ाने की सुविधा, ऑपरेशन की व्‍यवस्‍था और डॉक्‍टरों व नर्सों की उपलब्‍धता सुनिश्चित कराना ज्‍यादा जरूरी है। मरीजों को तुरंत और उचित इलाज मिले, इसकी पूरी व्‍यवस्‍था होनी चाहिए। अगर ऐसा हुआ तभी हर जिले में ट्रॉमा सेंटर खोलने का उद्देश्‍य पूरा हो पाएगा और सुप्रीम कोर्ट की भी यही मंशा है।

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