दिमाग भी खराब कर रही जहरीली हवा

488 0
  • पॉल्यूशन से अल्जाइमर और पर्किंसन का खतरा

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वायु प्रदूषण के मामले में भारत सबसे बुरी हालात वाले देशों में शामिल है। शिकागो-हार्वर्ड और येल विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों के अनुसार, भारत की हवा में घुला जहर इंसान के बर्दाश्त करने की सीमा से कहीं ज्यादा हैI इस वायु प्रदूषण का गहरा संबंध दिल और फेफड़ों की बीमारियों से ही नहीं बल्कि कैंसर तक से है। अब तो यह भी पता चला है कि हवा में घुले जहर शरीर के अलावा दिमाग भी खराब करने के लिए काफी हैं। बता रहे हैं रजनीश राज –  

वायु प्रदूषण या हवा में घुला हुआ जहर दिल, फेफड़े, सांस आदि पर अपना प्रभाव डालता है और इस प्रभाव के परिणामस्वरूप दुनिया भर में हर साल 30 लाख से ज्यादा लोगों की असमय मौत हो जाती है। इन अभागे लोगों में सबसे ज्यादा एशिया वाले होते हैं। यह भी समझ लेना जरूरी है कि हवा को जहरीला बनाने में कारखानों, गाड़ियों, जनरेटर वगैरह का ही धुआं नहीं, बल्कि हमारे इर्द-गिर्द उड़ रही धूल भी बहुत जिम्मेदार हैI धूल कण फेफड़ों में जमा होते रहते हैं जिसका विनाशकारी प्रभाव होता है। वायु प्रदूषण के कारण मस्तिष्क से जुड़ी गंभीर बीमारियों जैसे अल्जाइमर और पर्किंसन का जोखिम ज्यादा होता है।

हर सांस में जहर

सड़क किनारे उड़ती धूल, कंस्ट्रक्शन साइट्स पर उठता गुबार ये सब हमारे फेफड़ों के भीतर हर सांस के संग पहुंचता रहता हैI इनको शरीर के नेचुरल फ़िल्टर रोक नहीं पातेI ये कण एक दिन में अपना कारनामा नहीं दिखाते बल्कि धीरे-धीरे खून, स्पाइन के फ्लूइड और मस्तिष्क तक असर डालते रहते हैंI नतीजा यह होता है कि उम्र बढ़ने के साथ साथ ब्रेन एक दिन अल्जाइमर या पर्किंसन जैसी गंभीर बीमारी की गिरफ्त में आ सकता है।

 बच्चों की बुद्धि करता है कुंद

अत्यधिक वायु प्रदूषण बच्चों में स्मरण शक्ति की कमी और दिमाग को कुंद करने की ताकत रखता है। असल में शरीर में मौजूद एक विशेष जीन (अपोलीपोप्रोटीन एपसिलोन 4 अलेल) के वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से बच्चों का बौद्धिक स्तर 10 अंक तक घट सकता है। इससे बच्चों में शैक्षणिक और सामाजिक मुद्दों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इससे बच्चों में हिंसात्मक और क्रिमिनल प्रवृत्ति पनप सकती है। इसके अलावा बच्चों में अल्जाइमर जैसी बीमारियों के होने का खतरा अधिक होता है। वायु प्रदूषण जब सीमा से बहुत ज्यादा बढ़ जाता है तो मस्तिष्क में सूजन और न्यूरोडिजेनरेटिव बीमारियों के होने का खतरा बढ़ जाता हैI

दिमाग की संरचना और मनोदशा पर भी नकारात्‍मक असर

चीन में 2007  से 2014  के बीच वायु प्रदूषण में वृद्धि के कारण वहां खुशी के स्‍तर में करीब 22.5 प्रतिशत की गिरावट आई। खुशी में यह कमी ज्‍यादातर सड़क पर काम करने वाले मजदूरों, कम आयवर्ग वाले लोगों और छोटे बच्‍चों में देखने को मिली। वायु प्रदूषण के कारण दृश्यता कम होने से खुशी कम होने के साथ ही अवसाद के मामलों में भी बढ़ोतरी होती है।

भीड़-भाड़ वाले शहरों में कारों और कारखानों से निकलने वाला धुआं, यातायात, शोर और वायु प्रदूषण मिलकर स्‍मॉग को बढ़ाने का काम करते हैं और इंसान की तंत्रिकाओं पर प्रभाव डालते हैं। इससे व्‍यक्ति के मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य और मनोदशा पर नकारात्‍मक असर पड़ता है। लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने से यह दिमाग की संरचना और कामकाज को भी बदल सकता है। एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि गणित और मौखिक परीक्षणों में प्रदर्शन पर वायु प्रदूषण का काफी प्रतिकूल असर पड़ा है। इसका प्रभाव कम से कम दो साल तक रहता है।

प्रदूषण कम हो तो बढ़ जाती है 15 फीसदी उम्र

एक रिसर्च के मुताबिक, अगर हवा में मौजूद धूल कणों में 10 माइक्रोग्राम की कमी आती है तो व्यक्ति का जीवन काल 0.77 प्रतिशत प्रतिवर्ष बढ़ता है, जबकि कुल उम्र 15 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। पीएम 2.5 की मात्रा अत्यधिक प्रदूषण का संकेत मानी जाती है, जिससे विभिन्न बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

कुछ लोगों के दिमाग पर किए गए परीक्षण में 10 लाख मस्तिष्क टिश्यू में लाखों चुंबकीय पल्प कण पाए गए हैं। यह कण हमारे मस्तिष्क को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचा सकते हैं। मानव मस्तिष्क में पाए जाने वाले अधिकांश मैग्नेटाइट, चुंबकीय लोहे के ऑक्साइड के यौगिक का मुख्य रूप, उच्च मात्रा में उद्योगों से निकलने वाली प्रदूषित वायु की वजह से बनते हैं। जब अल्जाइमर से पीड़ित रोगियों की जांच की गई तो डॉक्टरों ने पाया कि उन रोगियों के दिमाग में मैग्नेटाइट के मौजूद होने की मात्रा उच्च है। चुंबकीय प्रदूषक कण मस्तिष्क तक पहुंचने वाले ध्वनियों और संकेतों को रोक देते हैं, जिससे अल्जाइमर रोग भी हो सकता है।

गर्भवती महिलाओं और अजन्मे शिशुओं को भी ख़तरा

गर्भवती महिलाएं प्रदूषित हवा में अपना जीवन बिताती हैं तो उनके ऊपर मस्तिष्क की विकृति, अस्थमा और मस्तिष्क का अल्‍प विकास जैसे विभिन्न रोगों का हमेशा खतरा बना रहता है। यदि एक गर्भवती महिला लगातार प्रदूषित हवा में सांस लेती है तो अजन्मा बच्चा मर भी सकता है। ऐसी महिलाओं के बच्चों में निमोनिया की आशंका बढ़ जाती है और बीमारियों से लड़ने की शक्ति कमजोर हो जाती है।

सन्दर्भ :

मोंटाना विश्वविद्यालय, अमेरिका

मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट ऑफ केमिस्ट्री, जर्मनी

पब्लिक हेल्थ स्कूल, वॉशिंगटन विश्वविद्यालय

‘अल्जाइमर्स डिजीज’ पत्रिका

अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (IFPRI), वाशिंगटन

Related Post

30 अप्रैल: कर्क राशि वाले ले जिंदगी का आनंद, मिल सकता है समुद्रीय यात्रा का मौका

Posted by - April 30, 2018 0
एस्ट्रो मिश्रा मेष :कोई मनोकामना पूरी होने का हर्ष होगा। सकारात्मक सोच कैसे जिंदगी में अच्छे परिणाम ला सकती है,…

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *