ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवि कुंवर नारायण नहीं रहे

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  • इतिहास और मिथक के जरिए वर्तमान को देखने के लिए जानी जाती हैं कुंवर की रचनाएं

नई कविता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर कवि कुंवर नारायण का 90 साल की उम्र में बुधवार (15 नवम्‍बर, 2017) को निधन हो गया। उन्‍होंने दिल्‍ली के चितरंजन पार्क स्थित अपने आवास में अंतिम सांस ली। बीती 4 जुलाई को ब्रेन हेमरेज के बाद से वह कोमा में थे। कवि कुंवर नारायण चितरंजन पार्क में पत्नी और बेटे के साथ रहते थे। उनके व्‍यक्तित्‍व और कृतित्‍व पर प्रकाश डाल रहे हैं धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी – 

मूलरूप से फैजाबाद के रहने वाले कुंवर नारायण पिछले 51 साल से साहित्य जगत में सक्रिय थे। अज्ञेय जी ने वर्ष 1959 में उनकी कविताओं को केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और विजयदेव नारायण साही के साथ ‘तीसरा सप्‍तक’ में शामिल किया। इसके बाद से उन्हें काफी प्रसिद्धि मिली। 1965 में ‘आत्‍मजयी’ जैसे प्रबंध काव्य के प्रकाशन के साथ ही कुंवर नारायण ने असीम संभावनाओं वाले कवि के रूप में पहचान बना ली। फिर तो ‘आकारों के आसपास’ (कहानी संग्रह-1971), ‘परिवेश : हम-तुम’, ‘अपने सामने’, ‘कोई दूसरा नहीं’, ‘इन दिनों’, ‘आज और आज से पहले’ (समीक्षा), ‘मेरे साक्षात्‍कार’ और हाल ही में प्रकाशित ‘वाजश्रवा के बहाने’ सहित उनकी तमाम कृतियाँ आईं।

कुंवर नारायण को अपनी रचनाशीलता में इतिहास और मिथक के जरिए वर्तमान को देखने के लिए जाना जाता है। कुंवर नारायण हालांकि मूलत: कवि थे, लेकिन उन्होंने कहानी, लेख व समीक्षाओं के साथ-साथ सिनेमा, रंगमंच में भी अहम योगदान दिया। उनकी रचनाओं का इतालवी, फ्रेंच, पोलिश सहित विभिन्न विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। उनकी पहली किताब ‘चक्रव्यूह’ 1956 में आई थी। वह आचार्य कृपलानी, आचार्य नरेंद्र देव और सत्यजीत रे से काफी प्रभावित रहे।

उन्‍हें मिले प्रमुख पुरस्‍कार
कुंवर नारायण को हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार, प्रेमचंद पुरस्कार, तुलसी पुरस्कार, केरल का कुमारन अशान पुरस्कार, व्यास सम्मान, शलाका सम्मान (हिंदी अकादेमी दिल्ली), उ.प्र. हिंदी संस्थान पुरस्कार और कबीर सम्मान मिल चुका है। साहित्य अकादमी ने उन्हें अपना वृहत्तर सदस्य बनाकर सम्मानित किया था। 1995 में उन्हें साहित्य अकादमी और 2009 में पद्म भूषण सम्मान भी मिला था। 2005 में कुंवर नारायण को साहित्य जगत के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

इस दौर के सर्वश्रेष्‍ठ साहित्‍यकार

कुँवर नारायण हमारे दौर के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार थे। उनकी काव्ययात्रा ‘चक्रव्यूह’ से शुरू हुई। इसके साथ ही उन्होंने पाठकों में एक नई तरह की समझ पैदा की। अपने काव्‍य संग्रह ‘परिवेश हम तुम’ में कुंवर नारायण मानवीय संबंधों की एक विरल व्याख्या प्रस्‍तुत करते हैं। उन्होंने अपने प्रबंध काव्‍य ‘आत्मजयी’ में कठोपनिषद को आधार बनाकर मृत्यु संबंधी शाश्वत समस्या को अद्भुत व्याख्या के साथ हमारे सामने रखा। इसमें नचिकेता अपने पिता की आज्ञा, ‘मृत्य वे त्वा ददामीति ’ अर्थात ‘मैं तुम्हें मृत्यु को देता हूँ’, को शिरोधार्य करके यम के द्वार पर चला जाता है, जहाँ वह तीन दिन तक भूखा-प्यासा रहकर यमराज के घर लौटने की प्रतीक्षा करता है। उसकी इस साधना से प्रसन्न होकर यमराज उसे तीन वरदान माँगने की अनुमति देते हैं। नचिकेता इनमें से पहला वरदान यह माँगता है कि उसके पिता वाजश्रवा का क्रोध समाप्त हो जाए। नचिकेता के इसी कथन को आधार बनाकर कुँवर नारायणजी की एक कृति 2008 में आई – ‘वाजश्रवा के बहाने’। उसमें उन्होंने पिता वाजश्रवा के मन में जो उद्वेलन चलता रहा, उसे अत्‍यंत सुंदर शब्दावली में काव्यबद्ध किया है। यह कृति आज के इस बर्बर समय में भटकती हुई मानसिकता को न केवल राहत देती है, बल्कि यह प्रेरणा भी देती है कि दो पीढ़ियों के बीच समन्वय बनाए रखने का समझदार ढंग क्या हो सकता है।

उनकी एक मशहूर कविता है – अयोध्या। यह वर्तमान में और भी प्रासंगिक हो गई है। इसे हम पाठकों के लिए प्रस्‍तुत कर रहे हैं –

अयोध्या, 1992
हे राम,
जीवन एक कटु यथार्थ है
और तुम एक महाकाव्य !

तुम्हारे बस की नहीं
उस अविवेक पर विजय
जिसके दस बीस नहीं
अब लाखों सर-लाखों हाथ हैं,
और विभीषण भी अब
न जाने किसके साथ है।

इससे बड़ा क्या हो सकता है
हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमट कर
रह गया तुम्हारा साम्राज्य !

अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं
योद्धाओं की लंका है,
‘मानस’ तुम्हारा ‘चरित’ नहीं
चुनाव का डंका है !

हे राम, कहाँ यह समय
कहाँ तुम्हारा त्रेता युग,
कहाँ तुम मर्यादा पुरुषोत्तम
कहाँ यह नेता-युग !

सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ
किसी पुराण – किसी धर्मग्रंथ में
सकुशल सपत्नीक…
अबके जंगल वो जंगल नहीं
जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक !

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