करप्शन के लिए मजबूर करती है राशन वितरण प्रणाली

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राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का उद्देश्य सभी लोगों अनाज उपलब्‍ध कराना है। इस कानून के तहत सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में 75 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 50 प्रतिशत आबादी को सस्‍ता अनाज देने की योजना है। इसके लिए हर जिले में सरकारी सस्‍ता गल्ला की दुकानें खोली गई हैं। राशन विक्रेताओं यानी कोटेदार को यह लक्ष्य पूरा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। सरकार से लेकर हर आदमी यही कहता आ रहा है कि इस सिस्‍टम में करप्‍शन बहुत है। पर क्‍या है असल कारण ? क्‍या पूरा सिस्‍टम ही करप्‍ट है या फिर पॉलिसी में कमी ही इसे बढ़ावा दे रही है ? पेश है रजनीश राज की रिपोर्ट –  

बेईमानी करना कोटेदारों की मजबूरी

राजधानी लखनऊ के एक कोटेदार का कहना है कि उन्हें अनाज वितरण के एवज में उचित कमीशन नहीं दिया जाता है जबकि सरकारी अधिकारियों को हर काम का पैसा चाहिए। पल्लेदारी, उठवाई और बंटाई में पैसे अलग से लगते हैं। जब इस पर बात करना चाहो तो कहा जाता है कि बोरा बेच कर काम चलाओ। कोटेदारों का दावा है कि सरकार तो उन्‍हें चोर ही मानती है।

बहराइच के एक कोटेदार का कहना है कि ढुलाई के लिए उनको अपनी जेब से खर्च करना पड़ता है और फिर गोदाम से भी कम सामान मिलता है। ऐसे में सभी ग्राहकों को राशन दे पाना संभव नहीं हो पाता है। सीतापुर के एक कोटेदार ने बताया कि खराब क्वालिटी का राशन उनके लिए सिरदर्दी बन जाता है। कभी नम या भीगा अनाज भी मिल जाता है, जिसे ग्राहक लेने से मना कर देता है। उसे गोदाम में भी वापस नहीं किया जा सकता है। ऐसे में सब आई-गई कोटेदार पर आ जाती है। कहीं से तो अपनी रोजी-रोटी भी चलानी होगी।

कोदेदारों की मांग

  • कमीशन नहीं 25 हजार रुपये वेतन चाहिए।
  • खाद्य गोदामों पर 50 किग्रा के बोरे में पांच से छह किलो अनाज कम मिलता है, इसलिए इलेक्‍ट्रॉनिक तराजू लगाया जाए।
  • राशन सामग्री उनकी दुकानों पर भिजवाने की व्‍यवस्‍था हो।
  • मिड-डे मील का अनाज सीधे विद्यालय भिजवाने की व्यवस्था हो।
  • भाड़े के बकाए का भुगतान शीघ्र हो।
  • विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ-साथ ग्राम प्रधान भी कोटेदारों का शोषण करते हैं। कोटेदारों के ऊपर अपात्र व्यक्तियों को मुफ्त में राशन, चीनी आदि देने का दबाव बनाते हैं।
  • यानी साफ है कि कोटेदारों को क्‍वालिटी अनाज से लेकर कम तोलाई और घूसखोरी का भी सामना करना पड़ता है।
कोटेदार से राशन लेती एक महिला

गोदाम से उपभोक्‍ता तक कैसे पहुंचता है राशन

कोटेदार को राशन गोदाम से लेना होता है, लेकिन कमी का बहाना बनाकर अक्सर पूरा राशन आवंटित ही नहीं होता है। ढुलाई और तोलाई का सिरदर्द भी कोटेदार का होता है। अपने मजदूरों से उसे राशन दुकान तक पहुंचाने की व्यवस्था करनी पड़ती है। कोटे की दुकान से फिलहाल कार्डधारकों को गेहूं, चावल और मिट्टी का तेल मिलता है।

क्‍या मिलता है कोटेदारों को

कोटेदारी के बदले में सरकार कोटेदार को नाम मात्र का कमीशन देती है। राजधानी के एक कोटेदार बताते हैं कि गेहूं और चावल पर प्रति किलो पर मात्र 70 पैसे कमीशन मिलता है। इसी प्रकार मिट्टी तेल में प्रति लीटर करीब 7 पैसे कमीशन की व्यवस्था है। जो बड़े कोटेदार हैं यानी जिनके पास उपभोक्‍ताओं की संख्‍या ज्‍यादा है, उन्‍हें तो कोई खास नुकसान नहीं होता लेकिन छोटे कोटेदारों को फायदा नहीं होता है। यही कारण है कि कोटेदार कमीशन की जगह मानदेय की मांग कर रहे हैं।

फिर भी नहीं मिलता राशन

कार्डधारक को सरकारी दुकानों से राशन मिल ही जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं है। अलीगंज के एक कार्डधारक ने बताया कि जिला आपूर्ति विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से फर्जी राशन कार्ड के जरिए कोटेदार राशन उठाते हैं, वही उसकी कमाई होती है। इसके साथ ही राशन न होने का बहाना बनाकर भी ग्राहकों को चूना लगाया जाता है।

बशीरतगंज के एक पात्र लाभार्थी का कहना है कि कोटेदार राशन और केरोसिन की कालाबाजारी भी करते हैं और घटतौली भी जमकर होती है। साल में दो या तीन महीने ऐसा होता है, जब कोटेदार राशन न आने या देरी का बहाना बनाकर राशन बांटते ही नहीं हैं। पात्र लाभार्थियों को यह भी शिकायत रहती है कि कभी चावल बांटा जाता है तो गेहूं नहीं मिलता और कभी गेहूं मिलता है, लेकिन चावल नहीं मिलता। इस तरह एक अनाज बचाकर भी कमाई की जाती है । कहने को तो इसकी शिकायत जिला खाद्य अधिकारी से की जा सकती है, लेकिन सुनवाई नहीं होती है।

कोटेदारों पर निगाह और नियंत्रण के लिए नई व्यवस्था

इलेक्‍ट्रॉनिक प्वाइंट्स ऑफ सेल (ई-पीओएस) मशीन

कोटेदारों पर निगाह और नियंत्रण रखने के लिए प्रदेश में सरकारी राशन वितरण के लिए नई व्यवस्था शुरू की गई है। नगर क्षेत्र की सभी दुकानों पर इलेक्‍ट्रॉनिक प्वाइंट्स ऑफ सेल (ई-पीओएस) मशीन लगाई जा रही है। इसमें उपभोक्ता की अंगुलियों के निशान आधार से मैच होने पर ही राशन मिलेगा। सूबे के सभी जनपदों में डिजिटल स्मार्ट राशन कार्ड परियोजना को आरंभ कर दिया गया है। जल्द ही पात्र लोगों को सस्ता राशन प्लास्टिक कार्ड (स्मार्ट राशन कार्ड) पर मिलेगा।

इस स्मार्ट राशन कार्ड में चिप लगी होगी, जिसमें कार्डधारक का नाम, सदस्यों के नाम, तय राशन, पता, आधार कार्ड संख्या समेत तमाम जानकारियां होंगी। इसको स्वाइप करने के लिए एक मशीन होगी, जो हर राशन की दुकान पर उपलब्‍ध रहेगी। मशीन में कार्ड स्वाइप करने पर इसकी पूरी जानकारी ऑनलाइन हो जाएगी। कोटेदार के खाते से तय राशन कम हो जाएगा। इसकी पूरी मॉनिटरिंग के लिए लखनऊ में स्पेशल सेंटर बनाया गया है। स्मार्ट कार्ड बनने के बाद राशन का पैसा डेबिट कार्ड से भी दिया जा सकेगा। स्मार्ट कार्ड के इस्तेमाल के लिए कोटेदारों को बायोमीट्रिक मशीनें दी गई हैं। इससे ग्राहकों की शिकायतें कम होगी और कोटेदार पर अंकुश रखा जा सकेगा।

पर इंटरनेट ने बढ़ाया सिरदर्द

आपूर्ति विभाग ने कोटेदारों को पीओएस मशीनें देकर तो अच्छा काम किया है, लेकिन नेट कनेक्टिीविटी हर समय उपलब्‍ध न होने के कारण इसके कई साइड इफेक्ट देखने को मिल रहे हैं। राशन कार्डधारकों को राशन लेने के घंटों लाइन में लगना पड़ता है। कोटेदारों का कहना है, जब इंटरनेट कनेक्टिविटी होगी, तभी कार्डधारक का अंगूठा मैच होगा और राशन वितरण की फीडिंग संभव होगी। इसमें काफी टाइम लगता है। फिलहाल अभी तक पर्ची सिस्टम से राशन का वितरण दुकानों से होता रहा है।

  क्‍या कहते हैं कोटेदार 

‘जब गोदाम से घटतौली मिलती है तो समस्या आती है। खाद्यान्न सत्यापन कर्मचारियों के साथ-साथ जनप्रतिनिधियों से भी कराया जाए तथा केरोसिन डिपो से मिट्टी के तेल व गोदामों से अनाज की घटतौली बंद कराई जाए। शिकायतों के समाधान के समय कोटेदार का पक्ष भी सुना जाए।’

बुधराम यादव, जिलाध्यक्ष, कोटेदार वेलफेयर एसोसिएशन

‘सरकार ने स्मार्ट कार्ड से आधार को जोड़ने की योजना तो बना दी है, लेकिन लाभार्थी आधार नंबर ही नहीं दे रहे हैं। ऐसे में फीडिंग नहीं हो पा रही है। इस वजह से राशन का वितरण भी सुगमता से संभव नहीं हो पा रहा है। अफसर इसका समाधान निकालने की बजाय कोटेदारों को परेशान करते हैं।’

राम प्रताप तिवारी, जिलाध्यक्ष, आदर्श कोटेदार एवं उपभोक्ता एसोसिएशन

  क्‍या कहते हैं जिम्‍मेदार

कोटेदारों पर कड़ी नजर रखी जा रही है, जिससे पात्र लोगों को राशन मिलने में किसी प्रकार की असुविधा न हो। वहीं राशन कार्ड धारकों का सत्यापन भी करवाया जाता है, ताकि पात्र लोग ही योजना का लाभ उठाएं और कालाबाजारी रुके। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम की पात्रता सूची में वंचित लोगों का नाम जोड़ने पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

आशुतोष मोहन अग्निहोत्री, एडीएम आपूर्ति

बदलाव की बयार 

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम की पात्रता सूची के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 2.99 करोड़ पात्र गृहस्थी कार्ड धारक हैं और से 13.34 करोड़ लाभार्थी हैं। इनको राशन उपलब्‍ध कराने के लिए प्रदेश में राशन की कुल 79790 दुकानें हैं। अधिनियम के तहत जहां हर गरीब को अनाज देने का बीड़ा सरकार का है तो वहीं अनाज की चोरी रोकना भी जरूरी है। इसके लिए सरकार पीडीएस को डिजिटल करने जा रही है। सरकारी राशन बांटने वाली सभी दुकानों को ऑनलाइन करने की भी योजना है। इससे पता चल सकेगा कितना राशन कोटेदारों ने बांटा और कितना उसके पास शेष है।

विभाग को शिकायत रहती है कि अक्सर कोटेदार गोदामों से राशन उठाते हैं और समय से बांटते नहीं हैं। नई व्यवस्था में कोटेदार पर निगाह रखना आसान हो जाएगा। उधर, कोटेदार को भी राहत मिलेगी कि उस पर शक की सुई नहीं उठेगी। ऑनलाइन व्यवस्था से यह भी पता चल जाएगा कि किस दिन कितना राशन बांटा गया। जल्द ही राशन कार्डधारकों को सब्सिडी की रकम सीधे उनके खाते में ही दी जाएगी। इससे फायदा यह होगा कि कार्डधारक जहां चाहे वहां से राशन खरीद सकता है।

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