‘न्यू टन’ का दमदार संदेश : लोकतंत्र सिर्फ बुलेट और बटन तक नहीं

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आप शहरों में, कस्बों में या फिर गांवों में रहते हैं, वोट देते हैं, नए-नए फोन, नोटबंदी और जीएसटी पर बातें करते हैं, फेसबुक पर लंबे-लंबे फेसबुक पोस्ट लिखकर ज्ञान देते हैं, लेकिन क्या आपने कभी उन इलाकों की कल्पना की है जहां इस बात से लोगों को फर्क ही नहीं पड़ता है कि दिल्ली में कौन सरकार बना रहा है, हमारे लिए चुनाव में कौन खड़ा है? ‘नोटबंदी’ और ‘जीएसटी’ से हमारी जिंदगी पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

निर्देशक अमित मर्सुकर ‘न्यूटन’ के साथ हमें एक ऐसी ही जगह पर लेकर चलते हैं, जहां हम करीब से उन लोगों से रुबरू होते हैं, जहां अभी नया-नया संविधान पहुंच रहा है और जहां चुनाव के बाद सिर्फ इतना ही फर्क पड़ता है कि नेताओं के पोस्टर बदल जाते हैं।

क्या है फिल्म न्यूटन की कहानी

फिल्म की कहानी नूतन कुमार उर्फ न्यूटन (राजकुमार राव) से शुरू होती है। न्यूटन छोटे शहर का एमएससी पास लड़का है, जिसकी नई-नई सरकारी नौकरी लगती है। न्यूटन ईमानदार कर्मचारी है या संजय मिश्रा की भाषा में कहे तो ‘उसे अपनी ईमानदारी का घमंड है’। इलेक्शन के वाले दिन न्यूटन की ड्यूटी छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाके में लगती है। घने जंगलों के बीच बसे उस गांव में 76 लोग वोटर लिस्ट में हैं। न्यूटन हेलीकॉप्टर से गांव तो पहुंच जाता है, लेकिन सुरक्षा के लिए तैनात असिस्टेंट कमांडेंट आत्मा सिंह (पंकज त्रिपाठी) न्यूटन को लगातार डराकर वोटिंग न कराने के लिए उकसाता है। न्यूटन तो ईमानदार है, वह किसी की नहीं सुनता और आखिर में पोलिंग बूथ पर पहुंच जाता है। लेकिन उसके सामने एक नई समस्या आकर खड़ी हो जाती है, नक्सलियों के डर से गांव वाले वोट डालने ही नहीं आते। अगर वो आ भी जाएं तो उन्हें पता ही नहीं उनके लिए चुनाव में कौन खड़ा है? उन्हें पता ही नहीं वोटिंग से क्या होने वाला है? वो जिंदगी में पहली बार ईवीएम मशीन देख रहे होते हैं। ऐसे में न्यूटन किस तरह लोगों का वोट लेगा? वोटिंग हो भी पाएगी या नहीं? वोटिंग के दौरान नक्सली हमला तो नहीं करेंगे? ऐसे कई सवाल हैं जिनका जवाब आपको सिनेमाहॉल में मिलेगा।

 

डायलॉग

फिल्म की कहानी और डायलॉग्स बहुत ही कमाल के हैं। फिल्म में एक डायलॉग है – ‘आप हमसे कुछ घंटे की दूरी पर रहते हैं लेकिन हमारे बारे में कुछ नहीं जानते हैं।’ यह डायलॉग दरअसल हम पर तंज कसता है। यह एक ब्लैक कॉमेडी फिल्म है, जिसके डायलॉग सुनकर आपके चेहरे पर हंसी तो आएगी लेकिन थोड़ी देर बाद आपको एहसास होगा कि यही इस देश की कड़वी सच्चाई भी है। न्यूटन जब अपनी शादी के रिश्ते के लिए जाता है और कहता है वो लड़की पढ़ी-लिखी नहीं है, कम से कम ग्रेजुएट तो होनी चाहिए लड़की। इस पर उसके पिता का जवाब होता है, ‘ग्रेजुएट लड़की क्या पैर दबाएगी तुम्हारे मां के?’

परफॉर्मेंस

अभिनेता राजकुमार राव फेस एक्सप्रेशन में माहिर हैं। फिल्म में वो अपने हाव-भाव और चेहरे से ही काफी कुछ कह जाते हैं। उन्हें जो भी किरदार दिया जाता है वो उसमें ढल जाते हैं। पंकज त्रिपाठी उर्फ आत्मा सिंह की अदाकारी भी काफी मजेदार है। रघुवीर यादव भी अपने रोल में परफेक्ट लगे हैं। अंजली पाटिल स्क्रीन पर नैचुरल लगी हैं।

देखें या न देखें ‘न्यूटन’

इस फिल्म को देखना या ना देखना आपके ऊपर है। फिल्म में राजकुमार राव एक ऐसे इलाके में जाते हैं जहां बुलेट से अधिक बैलेट मजबूत है। यह फिल्म आपको बताएगी कि लोकतंत्र सिर्फ बूथ और बटन तक सीमित नहीं है। इस फिल्म में मनोरंजन के पुट भी बहुत हैं। फिल्म की कहानी पर राजकुमार राव औऱ पंकज त्रिपाठी का अभिनय चार चांद लगाता है। फिल्म आपको जरूर देखनी चाहिए। न देखने की सिर्फ एक वजह हो सकती है कि आपको अच्छी फिल्में पसंद न हों।

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