पत्तियां देंगी ईंधन तो हवा से मिलेगा पानी

226 0
  • टॉप 10 तकनीक जो पहले से हैं मौजूद, 2-3 साल में आम जनता को मिलने लगेगा फायदा

जल्‍दी ही आपके पास ऐसी पत्तियां होंगी जो हवा में मौजूद कार्बनडाई ऑक्‍साइड को कार या इंजन चलाने वाले ईंधन में बदल देंगी। और तो और, आप अगर कहीं फंस जाएं और आसपास पानी नहीं मिल रहा हो तो हवा से ही पानी बना सकेंगी। ये सारी तकनीकें पहले से ही ईजाद हो चुकीं हैं। बस 2-3 साल में आपके पास भी पहुंच जाएंगी। केवल यही नहीं, चिकित्‍सा में भी तकनीक कमाल कर रही है। हर बीमारी के इलाज के लिए जीन आधारित वैक्‍सीन भी जल्‍द ही बाजार में आने वाली हैं। वर्ल्‍ड इकोनॉमिक फोरम ने ऐसी 10 तकनीकों की लिस्‍ट बनाई है जो 2-3 साल में आपकी दुनिया बदल सकती है। इस काम में साइंटिफिक अमेरिकन नामक संस्‍था ने भी मदद की है। पेश है  the2is.com टीम की रिपोर्ट –

तो ये हैं टॉप 10 तकनीक

  1. लिक्विड बायोप्‍सी : सरकारी आंकड़ों के अनुसार हर साल भारत में छह लाख लोग कैंसर से मर जाते हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण सही समय पर कैंसर का पता नहीं लग पाना है। इसके लिए बॉयोप्‍सी की जाती है। ज्‍यादातर मामलों में टिश्‍यू बेस्‍ड बॉयोप्‍सी ही की जाती है। इसके लिए जहां ट्यूमर की आशंका होती है, वहां से कुछ टिश्‍यू निकाल कर माइ‍क्रोस्‍कोप में जांच की जाती है। हालांकि कई मामलों में ये तरीका बहुत कारगर नहीं है। इसका तोड़ दिया है लिक्विड बॉयोप्‍सी ने। ये टेस्‍ट ट्यूमर से आने वाले खून का सैम्‍पल लेकर या खून में मौजूद ट्यूमर सेल्‍स का डीएनए लेकर जांच की जाती है। इस तरह की जांच का सबसे बड़ा फायदा है कि आप समय-समय पर कई बार सैम्‍पल ले सकते हैं, जिससे डॉक्‍टर ट्यूमर में हो रहे बदलावों को आसानी से पकड़ सकते हैं। इसके अलावा कई मामले ऐसे होते हैं जब टिश्‍यू बेस्‍ड बॉयोप्‍सी काम नहीं करती है। इसके अलावा लिक्विड बायोप्‍सी से ट्यूमर के बारे में काफी डिटेल जानकारी मिलती है। ट्यूमर के डीएनए से यह आसानी से पता लग जाता है कि उस पर दवा का क्‍या असर पड़ रहा है। दवा फायदा कर रही है या ट्यूमर दवा से ही लड़ रहा है।
  2. हवा से पीने वाला पानी : वैसे तो हवा से पानी निकालना कोई नई तकनीक नहीं है, लेकिन मौजूद तकनीकों में कई खामियां हैं। जैसे पानी पाने के लिए ये जरूरी है कि हवा में नमी काफी ज्‍यादा हो, जैसे कि आजकल उत्‍तर भारत का मौसम और उसे ढेर सारी बिजली भी चाहिए। यानी पानी कम खर्चे ज्‍यादा। हालांकि हाल ही में एमआईटी और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की एक टीम ने इसका भी तोड़ निकाल लिया है। उन्‍होंने पोरस यानी छेदों वाले क्रिस्‍टल का इस्‍तेमाल करके हवा से पानी निकाल लिया और इस काम में बिजली की भी कोई जरूरत नहीं पड़ी। इसी तरह एरिज़ोना के एक स्‍टार्टअप ने ऑफ ग्रिड सोलर सिस्‍टम (बैटरी वाले सोलर सिस्‍टम) की मदद से रोज हवा से 2-5 लीटर पानी निकाल कर दिखाया है। उन्‍होंने इस तकनीक को ‘जीरो मॉस वाटर’ नाम दिया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि आने वाले समय में बिना बिजली के रेगिस्‍तान में भी पानी निकाला जा सकेगा। इस उपलब्धि को ‘साइंस’मैग्‍जीन ने भी प्रमुखता से छापा है।

http://www.sciencemag.org/news/2017/04/new-solar-powered-device-can-pull-water-straight-desert-air

  1. डीप लर्निंग : कभी-कभी आप कोई चीज ऑनलाइन खरीदते हैं और फिर कोई भी वेबसाइट खोलने पर आपको उसी से जुड़े विज्ञापन दिखने लगते हैं। ये कमाल इंटरनेट बेस्‍ड डीप लर्निंग प्रॉसेस का ही है। डीप लर्निंग का इस्‍तेमाल गूगल, नेटफ्लिक्‍स और अमेजन जैसी कंपनियां बहुतायत से कर रही हैं। एमआर्इटी के वैज्ञानिकों ने तो यहां तक दावा किया है कि डीप लर्निंग की मदद से भविष्‍य की गणना भी की जा सकती है और पता लगाया जा सकता है कि आगे क्‍या होने वाला है। कस्‍टमर रिलेशनशिप मैनेजमेंट, टॉरगेटेट विज्ञापन, बॉयोइंफार्मेटिक्‍स, ऑटोमोबाइल, वाटर लेवल मॉनिटरिंग से लेकर मेडिकल डायग्‍नोसिस में भी इसका इस्‍तेमाल होने लगा है।आखिर डीप लर्निंग काम कैसे करती है? इमेज और डेटा दोनों को कम्‍प्‍यूटर इंसान से बेहतर एनालाइज कर सकते हैं। डीप लर्निंग से मतलब फोटो और डेटा की कई परतों की एनालिसिस बेहतर तरीके से करना ही है। फोटो, सिग्‍नल, ऑडियो, वीडियो, बातचीत या लिखे हुए शब्‍दों सबकी एनालिसिस कम्‍प्‍यूटर कर सकता है। यानी कई लेयर डेटा की एनालिसिस करने के बाद आपको रिजल्‍ट देता है जो काफी हद तक सही होता है।
  1. धूप से पेट्रोल जैसा र्इंधन : वैज्ञानिकों ने तो धूप की मदद से हाइड्रोकार्बन (पेट्रोल) ईंधन बनाने में सफलता हासिल की है। जैसे पेड़ अपनी पत्तियों की मदद से पानी को प्रॉसेस करके अपने लिए खाना बनाते हैं, वैज्ञानिकों ने भी लगभग उसी तकनीक का इस्‍तेमाल किया। उन्‍होंने धूप में काम करने वाले उत्प्रेरक का इस्‍तेमाल किया और पानी के अणुओं से हाइड्रोजन को अलग कर लिया। इसके बाद उसी हाइड्रोजन का इस्तेमाल सीओ2 (कार्बनडाईऑक्‍साइड) को हाइड्रोकार्बन में बदलने के लिए किया। आप जानते ही होंगे कि पेट्रोल और डीजल भी एक तरह के हाइड्रोकार्बन ईंधन हैं। ईंधन जलने पर जब कार्बनडाईऑक्‍साइड बनता है तो वायुमंडल में जाने की बजाय दोबारा ईंधन में बदल जाता है। अगर यह तकनीक हर काम में लग गई तो पर्यावरण प्रदूषण की समस्‍या पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है। इसके अलावा ये तकनीक सौर और पवन ऊर्जा से जुड़े उद्योगों के लिए क्रांतिकारी साबित हो सकता है।
  2. इंसान का नक्‍शा : सोचिए कि अगर हमें यह पता लग जाए कि शरीर के अंदर कितनी और कहां-कहां कोशिकाएं हैं, आपस में मिलकर कैसे काम करती हैं और शरीर को कैसे चला रही हैं। कैसे शरीर का हर अंग काम कर रहा है और कैसे सारे निर्देश एक-दूसरे तक पहुंचा रही हैं। जब कोई आनुवांशिक (जेनेटिक) बदलाव होता है या कोई जीवाणु या वायरस हमला करता है तो क्‍या बदलाव आते हैं। इतनी सारी जानकारी मिलने से छोटी से छोटी बीमारी और कैंसर जैसी बड़ी बीमारी का इलाज करना कितना आसान हो जाएगा। किसी भी बीमारी का सटीक डायग्‍नोसिस चु‍टकियों का काम होगा। वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय ग्रुप ने 2016 में इस काम की शुरुआत की थी, जिसे चैन जुकरबर्ग ने फंड किया है।
  3. बेहतर किसानी : दुनिया के किसान लगातार तकनीक को अपनाते जा रहे हैं। नई तकनीक उन्‍हें बेहतर और ज्‍यादा फसल उगाने में मदद कर रही है तो रसायन और पानी के कम इस्‍तेमाल में भी मदद कर रही है। सेंसर, रोबोट, जीपीएस, मैपिंग यंत्र और डेटा एनालिसिस सॉफ्टवेयर की मदद से वो ये जान पा रहे हैं कि उनके किस खेत में लगे किस पेड़ को क्‍या चाहिए। हालांकि ये तकनीकें कुछ देशों के किसानों तक सीमित हैं, जैसे ड्रोन की मदद से पौधों की हालत की जानकारी लेना। इसके बावजूद कम कीमत वाली तकनीकें जल्‍द ही हर किसान के पास मौजूद होंगी। उदाहरण के तौर पर, सिडनी विश्‍वविद्यालय की ‘सलाह सुकेरिया’ ने इंडोनेशिया में कम खर्च वाली तकनीक को पेश किया। इस तकनीक की मदद से आप सौर ऊर्जा और मोबाइल फोन की मदद से अपने खेत और हर पौधे पर हर समय नजर रख सकते हैं।
  4. जीरो प्रदूषण वाले वाहन : किसी भी तरह का प्रदूषण नहीं करने वाले वाहन की नींव तो काफी पहले रखी जा चुकी थी, हार्इड्रोजन से चलने वाली बैटरी की मदद से। हालांकि इस बैटरी में सबसे बड़ी कमी थी इसका उत्‍प्रेरक। ये बहुत महंगा और दुर्लभ धातु है, जिसका नाम है प्‍लैटिनम। हालांकि इस मामले में भी वैज्ञानिकों ने काफी काम किया और उन्‍होंने प्‍लैटिनम की जगह दूसरी धातु खोज निकाली और कुछ मामलों में तो वैज्ञानिकों ने किसी भी तरह की धातु इस्‍तेमाल नहीं की। यानी जल्‍दी ही आपको सस्‍ते और जीरो प्रदूषण वाली कारें सड़कों पर दिखेंगी।
  5. जीन आधारित टीके : जीन आधारित टीके कई मामलों में आम टीकों से बेहतर होते हैं। टीके एक तरह का वायरस या बैक्‍टीरिया ही होते हैं जो शरीर में रोग वाले जीवाणु से लड़ने के लिए एंटीबॉडी बनाने में मदद करते हैं। आमतौर पर टीके किसी सेल या अंडे में प्रॉसेस करके बनाए जाते हैं। ये तरीका बहुत समय लेने वाला और महंगा होता है, जबकि जीन आधारित टीके बेहतर, सस्‍ते और जल्‍दी बनने वाले होते हैं। इसके अलावा अगर शरीर में रोग फैलाने वाले जीवाणु दवा से लड़ने या किसी और कारण से अपने अंदर बदलाव लाते हैं तो ये टीके भी खुद को उसी तरह ढाल लेते हैं। इसके अलावा ये वैज्ञानिकों को उन लोगों को भी खोजने में मदद करते हैं जिनमें किसी रोग से लड़ने की ताकत होती है। इन लोगों की जीन्‍स से बनने वाला टीका जब किसी रोगग्रस्‍त के शरीर में जाता है तो उनमें भी उस रोग से लड़ने की ताकत आ जाती है और वे उस रोग के प्रतिरोधी बन जाते हैं।
  6. टि‍काऊ घर और मोहल्‍ले : पर्यावरण की मदद करने वाले घर कई वैज्ञानिकों का सपना हैं। ऐसे घर जिनमें कम से कम ऊर्जा खर्च हो और पानी की खपत भी। कैलीफोर्निया युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का प्रोजेक्‍ट अगर सफल हो गया तो स्‍मार्ट माइक्रोग्रिड से बनने वाली बिजली सरकारी बिजली की खपत को आधी कर देगी और कार्बन उत्‍सर्जन को लगभग जीरो। इसी तरह के दूसरे प्रोजेक्‍ट में बरसात के पानी के साथ नालियों और शौचालय के पानी के दोबारा इस्‍तेमाल का तरीका भी ईजाद कर लिया गया है जिससे पानी की खपत 70 प्रतिशत तक कम हो जाती है।
  7. क्‍वांटम कम्‍प्‍यूटिंग : सुपर कम्‍प्‍यूटर आज भी बड़ी-बड़ी कंपनियों तक ही सीमित है। वजह – उनको बनाने में कठिनाई और उनकी कीमत। हालांकि आर्इबीएम ने इसका तोड़ निकाला और उन्‍होंने क्‍लाउड पर सबसे पहले क्‍वांटम कम्‍प्‍यूटर की सुविधा दी। आज करीब 50 कंपनियां और बड़े स्‍टार्टअप क्‍वांटम कम्‍प्‍यूटिंग को असल दुनिया में लाने में लगे हैं। शायद जल्‍दी ही हर कंपनी सुपर कम्‍प्‍यूटर तक पहुंच सकेगी।

Related Post

शोधकर्ताओं का दावा : स्वास्‍थ्‍य के क्षेत्र में क्रांति ला सकते हैं बायो इलेक्ट्रॉनिक उपकरण

Posted by - October 15, 2018 0
नई दिल्‍ली। दुनिया भर में लोगों की उम्र और उनको होने वाली बीमारियों के आंकड़ों में तेजी से बदलाव देखा…

रिसर्च : वैज्ञानिकों को मिले प्राणी जीवन के प्राचीनतम साक्ष्य, ‘स्पंज’ है सबसे पुराना रूप

Posted by - October 20, 2018 0
लॉस एंजिलिस। वैज्ञानिकों ने भारत और अन्य जगहों से प्राचीन चट्टानों और तेलों में प्राणी जीवन के प्राचीनतम साक्ष्‍यों का पता…

WOW: चूहे हुए ठीक, अब अल्जाइमर पीड़ित भी हो सकेंगे स्वस्थ

Posted by - March 27, 2018 0
लंदन। क्लीवलैंड क्लीनिक लर्नर रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने चूहों में अल्जाइमर बीमारी को ठीक…

इस भारतीय इंजीनियर ने डीजल जेनरेटर से निकलने वाले धुएं से बना दी स्याही, तैयार की ये डिवाइस

Posted by - September 25, 2018 0
नई दिल्ली। भारत में छोटे-बड़े शहरों में मल्टीपलेक्स अपार्टमेंट्स, बड़े भवन परिसरों, शादी-ब्याह, समारोह में बिजली गुल होने पर बड़े-बड़े…

अब कार पार्क करने के लिए ना हों परेशान, एल्गोरिदम सुलझाएगा यह समस्या

Posted by - November 2, 2018 0
भारतीय मूल के अमेरिकी छात्र साईं निखिल रेड्डी ने पार्किंग की जगह ढूंढ़ने को बनाया एल्गोरिदम ह्यूस्टन। दुनिया के सभी…

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *