विलुप्‍त होने के कगार पर 200 साल पुरानी ‘हापा’ कुश्‍ती

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जब भी हम कुश्ती का नाम लेते हैं या इसके बारे में बात करते हैं तो अक्‍सर उसका मतलब पुरुषों की कुश्ती से लगाया जाता है। कुश्ती मतलब पुरुषों के बीच अखाड़े में लड़ी जाने वाली कुश्ती। लखनऊ जिले के सरोजनीनगर ब्‍लॉक के एक गाँव अहिमामऊ में महिलाओं की एक अलग तरह की कुश्ती होती है जिसे ‘हापा’ कहते हैं। बताते हैं कि इसकी शुरुआत  200 साल पहले हुई थी। क्या है ‘हापा’ की परम्‍परा, इसकी शुरुआत कैसे हुई, इस बारे में the2is.com के लिए दीपाली अग्रहरि की एक रिपोर्ट :

लखनऊ के अहिमामऊ गाँव में हर साल सावन में नागपंचमी के दूसरे दिन एक मेला लगता है, जो कई दिनों तक चलता है। इस मेले में आसपास के ज्यादातर गांवों के लोग आते हैं और मेले का आनंद उठाते हैं। इसी मेले में महिलाओं की कुश्‍ती की एक प्रतियोगिता भी होती है, जिसे ‘हापा कुश्‍ती’ कहते हैं। बताते हैं कि समाज में महिलाओं को सशक्त और उन्हें मजबूत बनाने के लिए करीब 200 वर्ष पहले बेगम नूरजहाँ और कमरजहाँ ने इस कुश्ती को शुरू किया जिसे ‘हापा कुश्ती’ के नाम से जाना जाता है। उस दौरान अहिमामऊ एक छोटी सी रियासत हुआ करता था और यहां महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। रियासत की महिलाओं को इसके लिए एक खास तरह का प्रशिक्षण दिया जाता था, लेकिन यह परम्‍परा धीरे-धीरे लुप्‍त होने लगी।



अहिमामऊ गांव में हापा कुश्‍ती में दांव आजमातीं दो महिलाएं

हापा कुश्ती की एक विशेषता यह है कि प्रतियोगिता के दौरान पुरुषों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित होता है। मैच का फैसला भी क्षेत्र की अनुभवी महिलाएं ही करती हैं। इस कुश्‍ती के कोई खास नियम-कायदे नहीं होते हैं। जिसने पहले अपने प्रतिद्वंद्वी को धूल चटा दी, वही महिला विजेता होती है। यही नहीं, इस दंगल को सिखाने के लिए कोई गुरु भी नहीं होता। महिलाएं अपनी बुजुर्गों से ही इसके दांव-पेंच सीखती हैं। हापा कुश्‍ती के लिए महिलाएं पूरे सोलह शृंगार करती हैं क्योंकि मान्यता है कि सोलह शृंगार कर कुश्ती लड़ने से कुल देवी प्रसन्न होती हैं। यह भी मान्यता है कि यदि हापा के अखाड़े की मिट्टी भूत-प्रेत से ग्रस्त व्‍यक्ति के माथे पर लगाई जाए तो उसे राहत मिलती है।

छह महीने पहले से होती है तैयारी

अहिमामऊ गाँव की प्रधान निशा सिंह बताती हैं कि नागपंचमी पर होने वाली हापा कुश्ती के लिए गाँव की महिलाएं 5-6 महीने पहले से ही कुश्ती सिखाने वाली विनय कुमारी और रामकली की निगरानी में तैयारी करती हैं। रोज शाम को दो से ढाई घंटे तक ये प्रैक्टिस करती हैं और कुश्ती के लिए खुद को तैयार करती हैं। हालांकि गाँव में कोई निश्चित अखाड़ा नहीं है, बाग़ है जहाँ महिलाएं ‘हापा कुश्ती’ के लिए तैयारी करती हैं। कुश्‍ती में भाग लेने वाली महिलाओं के लिए कोई खास डाइट नहीं होती, बस दूध और घी की मात्रा बढ़ा दी जाती है। प्रतियोगिता में 40 महिलाएं हिस्‍सा लेती हैं। 20–20 महिलाओं की टीम बनाई जाती है। प्रतियोगिता जीतने वाली महिला को नकद धनराशि और साड़ी इनाम में दी जाती है। 18 से लेकर 60 वर्ष तक की महिलाएं इस प्रतियोगिता में भाग लेती हैं।



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