90 फीसदी से ज्यादा ग्राहक नहीं करते ऑनलाइन बैकिंग पर भरोसा

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  • अमेरिकी ग्लोबल मार्केटिंग सर्विस कंपनी जेडी पॉवर की रिपोर्ट में खुलासा
  • भारत में बैंकों को लेकर कस्टमर सैटिफैक्शन महज 672 अंक

सरकार जहां एक तरफ लोगों को कैशलेस या ऑनलाइन पेमेंट का इस्‍तेमाल करने के लिए प्रोत्‍साहित कर रही है, लेकिन बैंकों का महत्त्व अभी ख़त्म नहीं हुआ है। इसी महीने प्रकाशित एक नए अध्‍ययन से ये जानकारी मिली है कि 94 फीसदी से ज्यादा रिटेल ग्राहकों ने पिछले 12 महीनों में कम से कम एक बार अपनी बैंक शाखा का दौरा जरूर किया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ऑनलाइन बैंकिंग के कई लाभ हैं, परंतु इसमें कई समस्‍याएं और खतरे भी हैंप्रस्‍तुत है the2is.com के लिए धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी की रिपोर्ट :

ऑरेकल जे.डी. पॉवर इंडिया ‘रिटेल बैंकिंग स्टडी’ के मुताबिक, डिजिटल बैंकिंग अभी तक भारत के लोगों के लिए व्यापक अनुभव नहीं बना है। जे.डी. पॉवर के वरिष्ठ निदेशक गॉडर्न शील्ड्स का कहना है, ‘ज्यादातर बैंकिंग रिश्ते अभी भी बैंक की शाखाओं से ही शुरू होते हैं और वहीं से जारी रहते हैं। हालांकि बैंकों में डिजिटल क्षेत्र में जाने की अभी और अधिक क्षमता है क्‍योंकि अभी केवल 51 फीसदी रिटेल बैंकिंग ग्राहकों का अपने मुख्य वित्तीय संस्थान के साथ विश्वसनीय ऑनलाइन अनुभव है।’



शील्ड्स बताते हैं, ‘वास्तव में भारत में बैंकों को लेकर ओवरऑल कस्टमर सैटिफैक्शन महज 672 अंक है, जबकि चीन में यह 806, अमेरिका में 793 और ऑस्ट्रेलिया में 748 है।’ वहीं इंडस्ट्री इनोवेशन एडवाइजर फायनेंशियल सर्विसेज कंपनी ऑरेकल के एपीएसी लीडर किरण कुमार केशवारापु का कहना है, ‘हमारा मानना है कि भारतीय बैंकों के ग्राहकों को ऑनलाइन लेनदेन करते समय सुरक्षा संबंधी चिंताएं होती हैं, जिन्‍हें आसानी से दूर किया जा सकता है।’

कास्पर्स्की लैबका सर्वे : बैंक भी सुरक्षा के प्रति चिंतित
‘कास्पर्स्की लैब’ कंप्यूटर और सूचना तकनीक में सुरक्षा-समाधानों की सबसे प्रसिद्ध और विश्वसनीय कंपनी मानी जाती है। सूचना तकनीक के लिए जोखिमों-संबंधी 2015 के वैश्विक सर्वे में उसका कहना है कि जिन कंपनियों, बैंकों इत्यादि को इस सर्वे में शामिल किया गया, उनमें से 47 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि सुरक्षा पर ख़र्च बढ़ाने के बावजूद उनका वित्तीय लेनदेन उतना सुरक्षित है, जितना होना चाहिए। इनमें से 32 प्रतिशत फ़र्में कुछ पहले या सर्वे के दौरान अपने कंप्यूटरों पर किसी न किसी साइबर हमले का निशाना बन चुकी थीं, यानी हर तीन में से एक कंपनी डेटा-चोरी झेल चुकी थी। 47 प्रतिशत कंपनियों ने कहा कि बैंकों को चाहिए कि वे ऑनलाइन बैंकिंग की सुरक्षा को और बेहतर बनाएं। दूसरे शब्दों में कहें तो ऑनलाइन, यानी इंटरनेट बैंकिंग को पूरी तरह सुरक्षित मानना एक ख़ामख़याली है। कास्पर्स्की लैब ने यह भी पाया कि डिजिटल बैंकिंग बढ़ने के साथ-साथ बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थानों को बढ़ती हुई ऑनलाइन धोखाधड़ी का भी सामना करना पड़ रहा है। इस सर्वे के आधार पर कास्पर्स्की लैब ने फिर यही निष्कर्ष निकाला है कि साइबर धोखाधड़ी हर प्रकार के काम में पैसों के सुरक्षित लेनदेन में अब भी सबसे बड़ी बाधा है।



ऑनलाइन या मोबाइल बैंकिंग के खतरे

स्वीडिश पुलिस बल के महानिदेशक और इंटरपोल के अध्यक्ष रह चुके ब्यौर्न एरिक्ससोन अनायास ही नहीं कहते कि नक़दी-मुक्त इंटरनेट बैंकिंग और मोबाइल बैंकिंग आज फैशन भले ही बन गया हो, लेकिन एक पूरा समाज नक़दी-मुक्त बन जाने में कई प्रकार के ख़तरे छिपे हैं। स्‍वीडन में ही पिछले एक दशक में बैंक खाते हैक होने की घटनाओं में दोगुने से ज्‍यादा की वृद्धि हुई है। अभी कुछ साल पहले मॉस्को में हैकरों ने कई जाली कोड की मदद से रूस के केंद्रीय बैंक में सेंध लगाकर दो अरब रूबल (तीन करोड़ दस लाख डॉलर से अधिक) के बराबर धनराशि लूट ली थी। इसी तरह की धोखाधड़ी 2015 में इक्वाडोर, फिलीपींस और वियतनाम के बैंकों के साथ भी हो चुकी है। एक अन्‍य घटना में फरवरी 2016 में हैकरों ने बांग्लादेश के केंद्रीय बैंक ‘बांग्लादेश बैंक’ के कंप्यूटरों को हैक कर 95 करोड़ 10 लाख डॉलर उड़ा लिये थे।
यहां प्रश्न यह उठता है कि जब विभिन्‍न देशों के केंद्रीय या राष्ट्रीय मुद्रा बैंक तक अपने कंप्यूटरों को साइबर अपराधियों के हमलों से बचा नहीं पाते तो हम-आप अपने कंप्यूटरों या मोबाइल फ़ोन को हैकरों के हमलों से भला कब तक और कितना बचा सकते हैं?

लखनऊ के अलीगंज निवासी शेषमणि शर्मा कहते हैं कंप्यूटर या मोबाइल फ़ोन से पैसों के लेन-देन का हर क़दम अपने पीछे जो निशान छोड़ेगा, उससे हर व्यक्ति सरकारों के लिए पारदर्शी बन जाएगा। सरकारें चाहें, तो इस सारी प्रक्रिया पर नज़र और नियंत्रण रख सकती हैं, कोई भी लेन-देन उनसे छिपा नहीं रहेगा। वे जिस किसी को अपने लिए कांटा समझेंगी, उसके क्रेडिट या डेबिट कार्ड को ब्लॉक कर सकती हैं। वह कहते हैं कि जो कोई नकदीमुक्त लेन-देन से जितना परहेज करता दिखेगा, सरकार की नजर में उतना ही संदिग्ध बनता जाएगा। वहीं जानकीपुरम निवासी मनीष त्रिपाठी एक और खतरे की ओर संकेत करते हैं। वह कहते हैं कि जब नकदी का चलन ही नहीं रह जाएगा, तब सरकारों को नोट छापने और सिक्के ढालने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। पैसे का कोई भौतिक अस्तित्व नहीं रह जाने से किसी संख्या के रूप में कम्प्यूटर में दर्ज पैसे की मात्रा घटाना-बढ़ाना भी बाएं हाथ का खेल बन जाएगा।
अगर हम थोड़ी देर के लिए इन सब आशंकाओं और खतरों को एक किनारे कर दें तो भी भारत जैसे विशाल जनसंख्‍या वाले विविधताओं से भरे देश में ऑनलाइन बैंकिंग की अपनी दिक्कतें हैं। देश की एक तिहाई आबादी आज भी निरक्षर है और 90 फीसदी से ज्‍यादा लेनदेन नकदी से होता है। आधी से ज्‍यादा आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है जहां बिजली का कोई भरोसा नहीं रहता। जब-जब बिजली चली जाएगी, बैंक से लेकर ग्राहक तक कोई कुछ नहीं कर पाएगा। इसके अलावा इंटरनेट कनेक्टिविटी भी एक बड़ी समस्‍या है।



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