ac coffin

ताकि कोई वंचित न रह जाये अंतिम दर्शन से

67 0

‘ताकि कोई अपनों के अंतिम दर्शन से वंचित न रह जाए।’ यह नारा है लखनऊ के हरीश कपूर का। कपूर इस नारे को साकार करते हैं जरूरतमंदों को “एसी कॉफिन” उपलब्ध कराके। कपूर जरूरतमंदों को यह सेवा मुफ्त में देते हैं। कपूर बताते हैं कि पैसे वाले लोग तो शव को सुरक्षित रखने का इंतजाम कर लेते हैं लेकिन जो लोग साधन संपन्न नहीं हैं उनका क्या? इस सेवा का उद्देश्य यही है कि किसी के निधन पर उनका कोई परिवारीजन अंतिम दर्शन से वंचित न रह जाए। हरीश कपूर ने यह सेवा 2014 में शुरू की थी। पेशे से हरीश एक बिजनेसमैन हैं, उनके बारे में बता रही हैं दीपाली अग्रहरी :



यह सेवा शुरू करने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?

कई बार लोगों को मजबूरी में शव को असम्मानजनक तरीके से रिक्शा आदि पर ले जाते देखा। यह देख कर मुझे बहुत दुःख होता था। मैंने सोचा कि कुछ ऐसा करूँ कि जिससे किसी को भी अपनी अंतिम यात्रा में ऐसी दुर्दशा न झेलनी पड़े। इसके बाद से ही मैंने वातानुकूलित शव बॉक्स सेवा शुरू की।

इस अनोखे शव बॉक्स की क्या विशेषताएं हैं?

यह कॉफिन लगभग 9 फुट लम्बा और ढाई फुट चौड़ा है। इसमें एक एसी लगा हुआ है। मृतक के परिवारीजनों के बुलाने पर मैं अपनी टीम के साथ उनके घर जाता हूँ और बॉक्स में शव को रखवाता हूँ। इसमें शव को अधिकतम 4 दिन रख सकते हैं।

आपके इस कार्य में आपके परिवार का कितना सहयोग है?

मैं खुशनसीब हूँ कि मुझे हर समय मेरे परिवार का साथ मिला है। मेरे परिवार वाले मेरी इस सेवा से बेहद खुश हैं। बस मेरी पत्नी मधु को मुझसे एक ही शिकायत है कि मैं उन्हें टाइम नहीं दे पाता क्‍योंकि कभी बिज़नेस के काम तो कभी समाज सेवा के कारण मैं अक्सर बिजी रहता हूँ।

अपनी टीम स्टाफ के बारे में कुछ बताइए

हमारे पास एक महिंद्रा गाड़ी है, ड्राइवर है और चार लड़के हैं। शव को बॉक्स में मृतक के घरवाले रखते हैं। कई बार ऐसा होता है कि परिवार के लोग बूढ़े होते हैं और उनके लिए किसी को कंधे पर उठाना आसान नहीं होता इसीलिए हमारी टीम उनकी मदद करती है।

आपकी सेवा को लेकर समाज के लोगों की क्या प्रतिक्रिया है?

सोसाइटी ने हमको काफी सपोर्ट किया है और कई बार हमको पैसों से तौला जाता है लेकिन मैं अपनी निशुल्क सेवा का उद्देश्‍य ख़राब नहीं करना चाहता हूँ। कुछ लोग ऐसे भी मिले हैं जो मुझे डोनेशन के नाम पर कॉफिन गिफ्ट करना चाहते हैं लेकिन मैं उनसे बस इतना ही कहता हूँ कि मेरे पास जितना है, मैं उतने में खुश हूँ। और अगर आपको कुछ करना ही है तो आप मेरे साथ चलिए और देखिए कि ये काम कैसे होता है। हाँ तो सब ही करते हैं लेकिन आजतक कभी कोई इस काम के लिए आगे नहीं आया क्‍योंकि पैसे फेंकने वाले लोग ये काम करने में रुचि नहीं रखते। हमारी इस सेवा में धर्म और जाति से कोई लेना-देना नहीं है।

हरीश कपूर को इस सेवा के लिए कई बार किया गया सम्मानित

इस सेवा के लिए आपको कोई कैसे एप्रोच करे ?

शुरुआत मैं मैंने विजिटिंग कार्ड बनवाया था, पर जैसे-जैसे समय बीतता गया प्रचार अपने आप ही हो गया। आज लखनऊ के लगभग हर मोहल्ले से मेरे पास फोन कॉल आते हैं। मैं पहले कुछ सवाल पूछता हूँ, जैसे कि कैसे डेथ हुई और कब? जब मुझे सब सही लगता है तब मैं उनसे एड्रेस मैसेज करने के लिए कहता हूँ।

आपको सेवा के दौरान किस तरह की तकलीफों का सामना करना पड़ता है ?

अभी जैसे हमारे पास 3 शव बॉक्स है और कई बार ऐसा होता है कि 4 बॉक्स के लिए फ़ोन आ जाता है, और उसके लिए मैं असमर्थ हो जाता हूँ। मेरे संसाधन सीमित हैं।

कभी किसी से मदद नहीं ली हरीश जी ने

लखनऊ के गोमती नगर निवासी जयंत अग्रवाल की दो बेटियां हैं, जो ऑस्ट्रेलिया में जॉब करती हैं और एक बेटा नार्वे में मर्चेंट नेवी में है। जयंत अग्रवाल की अचानक हार्ट अटैक से मृत्यु हो गई। उनके बच्चों के विदेश से आने में 5 दिन का समय लगना था। बॉडी को रोकने के लिए हरीश ने शव बॉक्स उनके परिवार को उपलब्ध कराया। जिस दिन हरीश बॉक्स उठाने उनके घर गए तो जयंत अग्रवाल की बड़ी लड़की ने रोते हुए बहुत धन्यवाद कहा और उसी समय एक लाख रुपये का चेक देने लगीं जिसे हरीश ने यह कह कर स्वीकार नहीं किया कि ‘मैं ये सेवा इसलिए देता हूँ जिससे आखिरी समय में कोई अपनों को देखने से न रह जाए। इसी में मुझे सुख मिलता है।’



Related Post

सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ रहा महिलाओं का ‘ग्रीन गैंग’

Posted by - April 12, 2018 0
मिर्जापुर में गैंग की महिलाएं गांव-गांव जाकर नशा करने वालों के खिलाफ चलाती हैं मुहिम महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और स्वच्छता…

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *