वैदिक प्लास्टर

अब बनेंगे ऐसे घर जिनमें नहीं होगी जरुरत ए.सी की

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वैदिक प्लास्टर रखे गर्मी में ठंडा और जाड़े में गर्म”

रिपोर्टर : दीपाली अग्रहरी

भारत के गाँवों में पुराने जमाने से घरों की दीवारों और फर्श को मिट्टी या गोबर से प्लास्टर या लीपने का प्रचलन रहा है। हालाँकि समय बीतने के साथ यह रिवाज अब सिर्फ उन घरों तक सीमित रह गया है जो मिट्टी के बने हुए हैं, लेकिन अब यह रिवाज शायद एक नए अवतार में वापस आने को है। जिस तरह गर्मियों का मौसम लंबा खिंचता जाने लगा है, उसमें बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन में यह विधि इंसुलेशन का कारगर तरीका साबित हो सकती है। इस दिशा में हरियाणा के एक वैज्ञानिक ने अभिनव प्रयोग किया है और ‘वैदिक प्लास्टर’ का निर्माण किया है। इस प्लास्टर के मूल में वही सदियों पुराना फार्मूला है लेकिन इसका कलेवर नया है।

वैदिक प्लास्टर के जनक हैं डॉ. शिव दर्शन मलिक जिन्होंने केमिस्ट्री में पीएचडी की है और वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाओं में बतौर सलाहकार काम भी किया है। डॉ. मलिक ‘वैदिक प्लास्टर’ का बाकायदा कमर्शियल उत्पादन करते हैं। उनका दावा है कि बिल्डिंग की बाहरी दीवारों पर इस प्लास्टर को करने से बढ़िया इंसुलेशन होता है जिससे ठण्ड और गर्मी बिल्डिंग के भीतर नहीं जा पाती।



वैदिक प्लास्टर
डॉ. शिव दर्शन मलिक

क्या है वैदिक प्लास्टर :

1. देसी गाय के गोबर से बना प्लास्टर है।

2. इससे ईंट और पत्थर की दीवारों को 2:1 के अनुपात में पानी का इस्तेमाल कर जोड़ा जा सकता है।

3. एक वर्ग फुट में करीब एक किलो प्लास्टर लगेगा जिसकी कीमत लगभग 10 रुपये प्रति किलोग्राम है। एक बोरी में 25 किलो वैदिक प्‍लास्‍टर आता है।

4. दीवारों में प्लास्टर के बाद तराई की जरूरत नहीं।

5. घर को नमी से बचाएगा।

पहले मिट्टी के बने और गोबर से लीपे गए कच्चे घरों में गर्मी को रोकने की क्षमता थी और उनमें सर्दी और गर्मी दोनों से बचाव होता था, लेकिन अब कच्चे मकान व्‍यावहारिक नहीं रहे इसीलिए पक्के मकानों को ही इस तरह का बनाने के लिए ऐसा प्लास्टर तैयार किया गया है जो गर्मी से बचाव कर सके।

हरियाणा के रोहतक जिले में है इसकी फैक्ट्री….

डॉ. शिव दर्शन मलिक, जिन्होंने केमेस्ट्री में पीएचडी के बाद कोई नौकरी न कर कई बड़ी–बड़ी कंपनियों, आईआईटी दिल्ली और वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाओं व यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट प्रोग्राम के साथ कंसलटेंट के रूप में काम करना पसंद किया।

सवाल : वैदिक प्लास्टर है क्या?

जवाब : मैं जब छोटा था तो मेरी माँ घर को लीपने के लिए अक्सर दूसरों के घर से मुझसे गोबर मंगाया करती थीं। उस समय मैं समझ नहीं पाता था कि वो ऐसा क्यों करती हैं। मैं कच्चे और पक्के दोनों तरह के घरों में रह चुका हूँ और दोनों में तापमान के अंतर को अच्छे से समझता हूँ। 2006 में सबसे पहले मैंने इसे अपने घर पर लगवाया और उन मकानों से इसकी तुलना की जहां सीमेंट से प्लास्टर किया गया था। मैंने देखा कि वैदिक प्लास्टर वाले घर में एसी या कूलर की कोई जरूरत नहीं पड़ी। घर वैसे ही ठंडा रहा। गर्मियों में इससे मकान ठन्डे रहे तो वहीं सर्दियों में इससे मकान गरम रहा।

सवाल : गाय का गोबर ही क्यों?

जवाब : चूंकि मैं साइंस का छात्र रहा हूँ इसलिए मुझे इसके पीछे एक वैज्ञानिक कारण मिला। गाय के गोबर में प्रोटीन होता है और प्रोटीन दीवारों के लिए बाइंडिंग का कम करता है। इसमें फाइबर की मात्र भी एक बराबर रहती है, न छोटे न बड़े, जो दीवारों को मजबूती देते हैं।

सवाल : एक आम आदमी या किसान तक यह कैसे पहुँच सकता है?

जवाब : कोई भी इसे खुद बना सकता है। अगर ऐसा करना संभव नहीं तो रोहतक से इसे मंगवा सकते हैं। हमारे यहाँ सप्लाई की भी सुविधा है। घर में वैदिक प्‍लास्‍टर बनाने के लिए कुछ सामग्रियों की जरूरत पड़ेगी।

बनाने की विधि :

20% चूने में 60% तालाब की चिकनी मिट्टी और 20% गाय के ताजे गोबर को मिलाकर वैदिक प्लास्टर तैयार किया जा सकता है। इस विधि से पांच किलो वैदिक प्‍लास्‍टर बनाने में 42 रुपए की लागत आएगी। दीवारों पर इसे लगाने का खर्च करीब 20 रुपये वर्गफुट आता है। इसमें मजदूरी शामिल नहीं है।

यह प्लास्टर दो से तीन मंजिल के मकानों की बाहरी और भीतरी दोनों दीवारों पर इस्तेमाल किया जा सकता है। रोहतक में 25 किलो के बैग वाला वैदिक प्लास्टर 210 रुपये का है। इस प्लास्टर की खासियत यह भी है यह घर को चारपांच साल तक गर्मी में ठंडा और सर्दियों में गरम रखेगा।

चूना दीवारों में मजबूती का काम करता है और चिकनी मिट्टी तापमान पर नियंत्रण रखती है। गाय के गोबर में सॉलिड नाम का फाइबर, डेडसेल और गाय जो खाना खाती है उससे बना एक एंजाइम पाया जाता है जो ऊष्मा रोधी होता है। इससे गर्मियों में घर ठंडा और सर्दियों में गर्म रहता है।



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