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अभिव्यक्ति की आजादी

ज़रूरी है अभिव्यक्ति की आजादी

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सुप्रीम कोर्ट फिर कर रहा दायरे पर विचार

मंत्री और सरकारी पदों पर बैठे लोगों की बयानबाजी भी दायरे में

क्या अनुच्छेद 19(1)(ए) में मिली अभिव्यक्ति की आजादी सिर्फ 19(2) के तहत नियंत्रित की जा सकती है

या फिर अनुच्छेद 21 के निष्पक्ष ट्रायल और गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार के तहत भी उस पर नियंत्रण संभव

  • धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी

सुप्रीम कोर्ट अभिव्यक्ति की आजादी के दायरे पर फिर विचार कर रहा है। कोर्ट इस मौलिक अधिकार को निष्पक्ष ट्रायल के मौलिक अधिकार से तुलना कर इसकी जांच-पड़ताल करेगा। देखा जाएगा कि बोलने की आजादी किस हद तक है? इसमें सरकारी पदों पर बैठे लोगों की बयानबाजी भी विचार के दायरे में होगी।

इस मामले पर 20 अप्रैल, 2017 को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की टिप्‍पणी थी – ‘भारत में सरकार के मंत्री या सरकारी अधिकारी या सरकार की ओर से प्रतिनिधित्व करने वाले किसी भी व्यक्ति को उस तरह की अभिव्यक्ति की आजादी नहीं दी जा सकती, जैसी कि आम आदमी को दी जाती है। ना ही वो सरकारी पॉलिसी के खिलाफ कोई बयान दे सकता है। उसे किसी भी प्रकार का बयान देने से पहले विचार करना होगा कि इसका क्या प्रभाव जाएगा।’ वहीं सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि महिलाओं से रेप और अन्य अपराधों के मामले में ओहदे पर बैठे शख्स द्वारा बयानबाजी का मामला संविधान पीठ को भेजा जा सकता है।



अगर वर्तमान संदर्भ में देखें तो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ भी बोल देने का चलन आम हो चला है। फिर बुद्धिजीवियों का एक खास समूह तुरंत अनुच्छेद 19(1) की आड़ लेकर उसके समर्थन में जुट जाता है। आज न सिर्फ भारत में, बल्कि पूरे विश्व में ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ को ढाल बनाकर अप्रिय स्थितियां पैदा की जा रही हैं। सोशल मीडिया के आने के बाद से तो इसके दुरुपयोग की जैसे बाढ़ सी आ गई है। अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ लेकर कभी दूसरे धर्मों का अपमान किया जाता है, मज़ाक उड़ाया जाता है और कभी चित्रों के माध्यम से, तो कभी आपत्तिजनक भाषा एवं बयानों से देश के माहौल को बिगाड़ने की कोशिश की जाती है।

वास्‍तव में यह अधिकार इसलिए दिया गया है ताकि भारत जैसे विविधता वाले देश में सबको अपनी बात कहने का मौका मिले। जाहिर है कि भारत जैसे विविधता वाले राष्ट्र में विचार और उसको अभिव्यक्त करने के तरीके भी भिन्न-भिन्न प्रकार के होंगे, इसलिए आवश्यक है कि अधिकारों में परस्पर सामंजस्य हो न कि विरोध, अन्यथा बोलने की आजादी के नाम पर अराजकता को बढ़ावा मिलेगा।

जेएनयू में 9 फरवरी, 2016 को खुलेआम ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे…’, ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं…’ और ‘कश्‍मीर की आजादी तक जंग रहेगी-जंग रहेगी’ के नारे लगने के बाद जब पुलिस ने जेएनयू स्टूडेंट यूनियन के प्रेसिडेंट कन्हैया कुमार के खिलाफ राजद्रोह का केस दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया और जेल भेजा, उसके बाद से ही इस मसले पर बहस तेज हो गई कि आखिर विचार अभिव्यक्ति के अधिकार की क्या सीमा है, यह सीमा कहां खत्म हो जाती है और कब नारेबाजी राजद्रोह के दायरे में आ जाती है? इसके कुछ दिनों बाद ही जेएनयू के समर्थन में पश्चिम बंगाल के जाधवपुर विश्‍वविद्यालय में भी इसी तरह के नारे लगे थे।

वहीं मंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर रहते हुए सपा नेता आजम खान द्वारा बुलंदशहर सामूहिक दुष्कर्म कांड पर टिप्पणी का मसला जब सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था तो कोर्ट ने इस कानूनी पहलू पर विस्तृत सुनवाई का मन बनाकर चार कानूनी प्रश्न तय कर दिए थे। आजम खान ने आरोप लगाया था कि बुलंदशहर गैंग रेप केस विरोधी पार्टियों की साजिश भी हो सकती है, ताकि तत्कालीन अखिलेश सरकार को गिराया जा सके। आजम खान के इस बयान पर रेप पीड़िता के पिता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें पिता ने कहा था कि मंत्री के बयान से जांच प्रभावित होगी और केस को यूपी के बाहर ट्रांसफर करने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने आजम खान को इस टिप्पणी पर फटकार लगाई थी। साथ ही कोर्ट ने यह जांच करने को कहा था कि क्या एक मंत्री इस तरह की बयानबाजी कर सकता है, खासकर यौन उत्पीड़न के मामले में? हालांकि आजम खान ने बाद में बिना शर्त माफी मांग ली थी और कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई बंद कर दी थी।

बुलंदशहर गैंगरेप पर आजम खान की टिप्‍पणी के मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता फली नरीमन ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, ‘कोर्ट को देखना होगा कि इस मामले में कहां तक जा सकते हैं। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) (अभिव्यक्ति की आजादी) और इस आजादी पर तर्कसंगत पाबंदियों 19(2) पर विचार करते समय काफी सावधान रहना होगा।’ उनका कहना था कि संविधान में इस तरह की टिप्पणियों पर रोक नहीं है। अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने भी कहा कि पूर्व मंत्री आजम खान का बयान आर्टिकल 19(1)(ए) के तहत मिली अभिव्यक्ति की आजादी के दायरे में आता है। अगर किसी को इससे ठेस पहुंची है तो वह सपा नेता के खिलाफ सिविल/आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर कर सकता है। दूसरी तरफ वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे का कहना था, ‘सवाल ये नहीं है कि अनुच्छेद 19(1)(ए) में मिली अभिव्यक्ति की आजादी पर सिर्फ 19(2) में तय पाबंदियों पर ही रोक लग सकती है। सवाल है कि 19(1)(ए) में मिली अभिव्यक्ति की आजादी कहां तक है? क्या कोई किसी को अपशब्द कहेगा तो वह अभिव्यक्ति की आजादी में आएगा? नहीं, ऐसा नहीं है। इन्हीं सब पहलू पर विचार करना होगा।’



इस पर कोर्ट ने अभिव्यक्ति की आजादी पर संविधान में दी गई पाबंदियों का जिक्र किया जिसमें कानून व्यवस्था और नैतिकता व शिष्टाचार को देखते हुए पाबंदियों की बात कही गई है। जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा, ‘ये देखना होगा कि क्या अनुच्छेद 19(1)(ए) में मिला अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार पूर्ण है? क्या सरकारी पद पर बैठे व्यक्ति को अधिकार है कि वह दुष्कर्म जैसे अपराध या पीड़िता पर टिप्पणी करे जिससे पीड़िता के अधिकार प्रभावित होते हों।’ कोर्ट ने कहा, उदाहरण के तौर पर अगर कोई एफआईआर दर्ज होती है तो अभियुक्त इस पर कोई भी टिप्पणी कर सकता है, लेकिन क्या पुलिस महानिदेशक के पद पर बैठा अधिकारी यह टिप्पणी कर सकता है कि मामला राजनीतिक साजिश का नतीजा है? ऐसे में जांच का सवाल ही कहां रह जाएगा? अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी का हालांकि कहना था कि नैतिकता और शिष्टाचार के आधार पर आपराधिक अभियोजन नहीं चलाया जा सकता। ऐसे तो कोई कुछ बोल ही नहीं पाएगा। पीठ के दूसरे न्यायाधीश न्‍यायमूर्ति एएम खानविलकर ने कहा कि इस मामले को संविधान में दिए गए मूल कर्तव्यों के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि विचार का मुख्य प्रश्न यह है कि क्या अनुच्छेद 19(1)(ए) में मिली अभिव्यक्ति की आजादी सिर्फ 19(2) के तहत नियंत्रित की जा सकती है या फिर अनुच्छेद 21 के निष्पक्ष ट्रायल और गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार के तहत भी उस पर नियंत्रण लगाया जा सकता है?

क्‍या कहता है संविधान

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के तहत देशवासियों को भाषण और अभिव्यक्ति की आज़ादी है। कोई भी नागरिक व्यक्तिगत, लेखन, छपाई, चित्र, सिनेमा इत्यादि के माध्यम से किसी भी मुद्दे पर अपनी राय और विचार दे सकता है। यह उसका मौलिक अधिकार है, लेकिन संविधान  के अनुच्छेद 19(2) में उन आधारों का उल्लेख किया गया है जिनके तहत राज्य भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगा सकता है। इसके तहत ऐसे किसी भाषण या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है जिससे –

1. देश की सुरक्षा को ख़तरा हो

2. विदेशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों पर आंच आए

3. सार्वजनिक व्यवस्था/ क़ानून व्यवस्था खराब हो

4. शालीनता और नैतिकता पर आंच आए

5. अदालत की अवमानना हो

6. किसी की मानहानि हो

7. किसी अपराध के लिए प्रोत्साहन मिले, और

8. भारत की एकता, संप्रभुता और अखंडता को ख़तरा हो

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्‍यप के अनुसार, ‘राज्‍य की कार्रवाई के विरुद्ध स्‍वतंत्रताओं के संरक्षण का अधिकार सभी नागरिकों को सुलभ है, लेकिन यह कोई आत्‍यंतिक या असीमित अधिकार नहीं है। हमारी स्‍वतंत्रता के साथ संविधान ने कुछ जिम्‍मेदारियां भी तय की हैं। जैसा कि न्‍यायमूर्ति दास ने कहा है – ‘बेहतर होगा कि व्‍यक्तिगत स्‍वतंत्रता का सामाजिक हित अन्‍य वृहत्‍तर सामाजिक हितों के अधीन हो।’ (ए. के. गोपालन बनाम मद्रास राज्‍य, एआईआर 1950, एससी 27)। सुभाष कश्‍यप के अनुसार, ‘भाषण और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के अधिकार पर प्रतिबंध लगाने का उपबंध 1963 में 16वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया था ताकि कोई भी व्‍यक्ति भारत की अखंडता या संप्रभुता को चुनौती न दे सके।’

न्यायमूर्ति पीएन भगवती
न्यायमूर्ति पीएन भगवती

मेनका गांधी बनाम भारतीय संघ के मामले में न्यायमूर्ति पीएन भगवती ने बोलने की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी के महत्व पर ज़ोर देते हुए व्यवस्था दी थी कि ‘लोकतंत्र मुख्य रूप से स्वतंत्र बातचीत और बहस पर आधारित है। लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश में सरकार की कार्रवाई के उपचार के लिए यही एक उचित व्यवस्था है। अगर लोकतंत्र का मतलब लोगों का, लोगों के द्वारा शासन है, तो यह स्पष्ट है कि हर नागरिक को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार होना ज़रूरी है और अपनी इच्छा से चुनने के बौद्धिक अधिकार के लिए सार्वजनिक मुद्दों पर स्वतंत्र विचार, चर्चा और बहस बेहद ज़रूरी है।

प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र
प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र

‘सरकार में उत्तरदायित्व स्वीकार करने के साथ व्यक्ति को अपने विचार सामूहिक उत्तरदायित्व की परिधि में ही व्यक्त करने चाहिए। सरकार की नीतियों को कार्य के स्तर पर लाने के लिए इस तरह की प्रतिबद्धता आवश्यक है। वाक् स्वातंत्र्य उच्छृंखल व्यवहार की अनुमति नहीं देता है और किसी को भी इसकी छूट नहीं मिलनी चाहिए। राजनेताओं के लिए अनुशासन और भी ज़रूरी हो जाता है क्योंकि जनता की नज़रें उनकी ओर लगी रहती हैं। वे उनके लिए आदर्श और मॉडल होते हैं। दुर्भाग्य से व्यक्ति-पूजा को सफलता की सीढ़ी मानने वाले लोग, ख़ास कर युवा, अपने नेता के हाव-भाव को अपनाने लगते हैं और उन्हीं के लहजे में बात करने की कोशिश करते हैं। और बोलना सिर्फ़ बोलना नहीं होता है, बोल कर हम बोली गई बात से ख़ुद को प्रतिबद्ध कर लेते हैं। ख़ास तौर पर तब जब वह बात सार्वजनिक मंच से कही गई हो। अतः मंत्री या अधिकारी के रूप में सार्वजनिक जीवन जीने वाले को स्वयं पर नियंत्रण करना चाहिए और संयम अपनाते हुए ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जो जनमानस में विद्वेष पैदा करे। लोक मानस बड़ा संवेदनशील होता है और आज के तीव्र वेग वाले मीडिया के ज़माने में कोई भी बात बहुत जल्द आग की तरह  फैल जाती है। ऐसे में और सावधानी बरतनी चाहिए।’

–  प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र, वाइस चांसलर, महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा

डॉ. हेमन्‍त जोशी
डॉ. हेमन्‍त जोशी

‘बहुत से लोग आज भी मानते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता। हालांकि गोपनीयता शपथ पर ध्यान दें या सरकारी अधिकारियों की आचार संहिता को देखें तो स्पष्ट होता है कि अभिव्यक्ति की जिस स्वतंत्रता का लाभ किसी सामान्य नागरिक को मिलता है, वह विशिष्ट पदों पर बैठे लोगों को नहीं है। यह बाध्यता उन लोगों ने स्वयं चुनी है, फिर शिकायत क्यों?’

–  डॉ. हेमन्‍त जोशी, अध्‍यक्ष हिन्‍दी विभाग, भारतीय जन संचार संस्‍थान, नई दिल्‍ली

डॉ. ज्‍योतिष जोशी
डॉ. ज्‍योतिष जोशी

‘प्रत्‍येक नागरिक अपनी सहमति-असहमति को व्‍यक्‍त करने का अधिकार रखता है, चाहे वह सामाजिक मामला हो या व्‍वस्‍थागत। पर इस अधिकार का अर्थ यह नहीं है कि हम अपनी अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के नाम पर दूसरे की भावनाओं को कुचल दें या किसी भी तरह की ठेस पहुंचाएं। यह स्‍वतंत्रता धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और पारिवारिक सीमाओं से बंधी है। यह सीमा जितनी सामान्‍य नागरिक पर लागू होती है, उससे कहीं अधिक जिम्‍मेदार पदों पर बैठे लोगों पर लागू होती है। अत: ऐसे लोगों को अधिक निष्‍ठा से इसका पालन करना चाहिए और अपने आचरण से इसे समाज के लिए आदर्श बनाना चाहिए।

–  डॉ. ज्‍योतिष जोशी, संपादक, ‘समकालीन कला’, ललित कला अकादमी, नई दिल्‍ली 

सीनियर एडवोकेट अमन लेखी का कहना है कि अभिव्यक्ति का अधिकार पूर्ण अधिकार नहीं है, बल्कि इसके लिए ‘रीजनेबल रिस्ट्रिक्शन’ की भी बात है। लोगों को अभिव्यक्ति के अधिकार के साथसाथ उनकी जिम्मेदारी भी तय है। मूल अधिकार के तहत अभिव्यक्ति की आजादी है और लोकतंत्र में यह काफी बड़ा अधिकार है। लेकिन इसकी सीमाएं जहां खत्म होती हैं, उसके बाद रीजनेबल रिस्ट्रिक्शन के दायरे को अगर कोई लांघता है तो फिर वह कानून के दायरे में आ जाता है। अगर बयान देशद्रोह वाला हो तो देशद्रोह का केस बनता है। अगर किसी और की मानहानि करता है तो मानहानि का केस बनता है। अगर कोर्ट की अवमानना करता है तो कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट बनता है यानी बयान के कंटेंट पर यह निर्भर करता है कि क्या अपराध बनेगा।

अब यह देखना दिलचस्‍प होगा कि सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले में नए संदर्भों को ध्‍यान में रखते हुए ऐसे कौन से आधार तय करता है, जिनके तहत अभिव्‍यक्ति की आजादी पर न्‍यायोचित प्रतिबंध लगाया जा सकता है।



 

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