जेनेरिक दवा

सस्ती जेनेरिक दवा का वादा, लेकिन कहां मिलती हैं ये सस्ती दवाएं !

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डॉक्टर को लिखनी होगी जेनेरिक दवा, मोदी सरकार जल्द बनाएगी कानून

जन औषधि केंद्र के जरिये उत्‍तर प्रदेश में 450 जेनेरिक दवाएं कम कीमत पर हैं उपलब्‍ध

आखिर खलनायक कौन?

 

केंद्र सरकार ने 2008 में प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि योजना शुरू की थी। इसका उद्देश्य यही था कि मरीजों तक कम कीमत पर जेनेरिक दवाइयां पहुंचें। लेकिन आज भी ज्‍यादातर लोग ये नहीं जानते कि यह योजना और जेनेरिक दवाएं हैं क्या ? लोगों का यह भी कहना है कि जब डॉक्‍टर ही जेनेरिक दवाएं नहीं लिखते तो वे इन पर कैसे विश्‍वास करें? प्रस्‍तुत है धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी की पड़ताल – 

इसके पीछे खलनायक कौन?

एक ऐसी पॉलिसी जो ठीक से इम्प्लीमेंट नहीं हुई?

वो डॉक्टर्स जो आज भी मरीजों को जेनेरिक दवाएं नहीं लिखते।

डॉक्टरों और ब्रांडेड दवाइयां बना रहीं मल्‍टीनेशनल कंपनियों के बीच मिलीभगत

इम्प्लीमेंट करने वाली एजेंसी बीपीपीआई कहती है कि जेनेरिक दवाओं के प्रचार के लिए उसके पास फण्ड ही नहीं।

डॉक्टर प्रिस्क्रिप्शन पर साल्ट युक्त दवा लिखते नहीं तो आम जनता तक जेनेरिक दवाओं की जानकारी आखिर पहुंचे कैसे? लोगों को न तो दवाओं की जानकारी है और न ही इनके केन्द्रों की, जहाँ ये आसानी से मिल रही हैं। गरीब जनता के हित में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो कह दिया कि सरकार एक ऐसा कानून बनाने पर विचार कर रही है जिसके तहत डॉक्‍टर अब मरीजों के प्रिस्क्रिप्शन पर दवाओं के ब्रांड की बजाय उनके जेनेरिक नाम ही लिखेंगे, लेकिन इसका पालन किस हद तक होता है, यह देखना होगा।

जेनेरिक दवा

उत्तर प्रदेश में जन औषधि के 150 केंद्र

अभी तक उत्तर प्रदेश में जन औषधि के 150 केंद्र काम कर रहे हैं, जहां 450 तरह की जेनेरिक दवाएं हैं। कैंसर जैसी बीमारियों के लिए ब्रांड के नाम पर जो दवा लाख रुपये की मार्किट में हैं, वही दवा इन केन्द्रों में सस्‍ते दाम पर मिल जाती हैं। लखनऊ में चार जन औषधि केंद्र हैं, जो इंदिरा नगर, देवा रोड, लाटूश रोड और जानकीपुरम में हैं। जब प्रदेश की राजधानी में इनकी संख्‍या इतनी कम है तो अन्‍य जिलों में इनकी क्या स्थिति होगी, इसका आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं। ऐसे में ग्रामीण इलाकों में इन केंद्रों की कल्‍पना करना मुश्किल है।

हाल ही में 18 अप्रैल, 2017 को रामपुर जिले में जेनेरिक दवाओं के स्‍टोर का उद्घाटन किया गया। रामपुर मंडल में खुली ये अकेली दुकान है। इनकी कम संख्‍या सरकार की मंशा पर भी सवाल खड़े करती है।



क्‍या कहते हैं जन औषधि केंद्र चलाने वाले ?

लखनऊ के इंदिरानगर में जन औषधि केंद्र चला रहे रघुवीर चौधरी बताते हैं कि एक सामान्य दवा की दुकान की तुलना में इन केंद्रों से कमाई बहुत ही कम है। उन्होंने कहा कि ग्राहक ब्रांडेड दवाओं की ही मांग करते हैं क्योंकि ज्‍यादातर लोगों को दवाओं में इस्‍तेमाल सामान्य साल्‍ट का नाम ही नहीं पता होता है। रघुवीर का मानना है कि जेनेरिक दवाओं और जन औषधि केंद्रों को बढ़ावा देने के लिए सरकार को इनके बारे में लोगों को जागरूक करना चाहिए। वह अपनी दुकान का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि केवल जेनेरिक दवाएं बेचकर कर्मचारियों और दुकान का खर्च ही नहीं निकल पाता। यही कारण है कि व्यवसाय चलाने के लिए उन्‍हें मजबूरी में अपनी दुकान पर कुछ अन्य उत्पादों को रखना पड़ता है।

जन औषधि केंद्र की नियमावली में लिखा है कि ऐसी दुकान चलाने वाला अपनी दुकान का नाम जन औषधि केंद्र ही रखेगा। वह अपनी दुकान किसी और नाम से नहीं चला सकता। रघुवीर कहते हैं कि इसकी वजह से लोगों को लगता है कि ये आयुर्वेदिक या होम्‍योपैथिक दवा की दुकान है। उनके अनुसार, दवा की अन्य दुकानों की तुलना में उनकी दुकान पर बिक्री बहुत कम है क्‍योंकि उपभोक्‍ता हिंदी में ‘जन औषधि’ नाम देखकर इसे आयुर्वेदिक दवा की दुकान समझ लेते है और दूसरी दुकान पर चले जाते हैं।

डॉक्टरों को भी नहीं है जानकारी

सच्‍चाई यह है कि प्राइवेट और सरकारी अस्‍पतालों के डॉक्टरों को भी इस योजना के बारे में ठीक से जानकारी नहीं है। जब उन्‍हें योजना के बारे में बताया गया तो डॉक्‍टरों ने कहा कि अगर वे जेनेरिक दवाएं लिख भी देते हैं तो मरीजों को इसे ढूंढ़ने और खरीदने में बहुत ज्यादा मुश्किल आएगी।

प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाली लखनऊ की डॉ. कल्‍याणी मलिक कहती हैं कि अव्‍वल तो जन औषधि केंद्र कहां है, इसका पता लगाना ही मरीजों के लिए टेढ़ी खीर है, यही कारण है कि मरीज स्‍थानीय दवा दुकान पर जाने को बाध्‍य हो जाते हैं जहां आसानी से दूसरी कंपनियों की दवाएं उपलब्ध हैं। हालांकि, उन्होंने इस योजना की सराहना करते हुए कहा कि यह निस्संदेह गरीब मरीजों के हित में है, लेकिन इसका अच्‍छी तरह प्रचार होना चाहिए।

जेनेरिक दवा

एक अन्‍य निजी चिकित्‍सक डॉ. तरुण अग्रवाल तो जेनेरिक दवाओं की विश्वसनीयता और उनके लाभकारी होने पर ही संदेह करते हैं। उन्होंने कहा कि हमें जेनेरिक दवा की संरचना पर ध्यान देना होगा क्योंकि हम जो दवाएं लिखते हैं, उनमें कई अतिरिक्त दवाइयां भी रहती हैं जो जरूरी नहीं कि जेनेरिक दवा में भी हों।

एक निजी क्‍लीनिक के मालिक आशीष कुमार श्रीवास्तव ने भी जेनेरिक दवाओं की सराहना की। उनका मानना है कि ब्रांडेड दवाओं पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा देना चाहिए। उन्होंने कहा कि सस्ती दर पर अच्‍छी गुणवत्‍ता की दवाएं उपलब्‍ध कराना निस्संदेह भारत सरकार का एक अनूठा कदम है। उन्होंने कहा कि सरकार को निजी डॉक्टरों को भी जेनेरिक दवाएं उपलब्‍ध करानी चाहिए ताकि वे इसे सीधे रोगियों को दे सकें, जिससे गरीब मरीजों को इसका लाभ मिले।

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भी अनजान

लखनऊ के मुख्‍य चिकित्‍सा अधिकारी जीएस बाजपेयी ने इस योजना के बारे में अनभिज्ञता जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें अभी तक राज्य सरकार की ओर से इस बारे में कोई आदेश नहीं मिला है। वहीं दूसरी तरफ राम मनोहर लोहिया अस्‍पताल के वरिष्ठ त्वचा विज्ञानी डॉ. एस. अहिरवार का कहना है कि सरकारी अस्‍पतालों में लाइसेंसी दवा की दुकानों पर प्रतिबंध लगाकर वहां जेनेरिक दवाएं उपलब्‍ध करानी चाहिए।

जेनेरिक दवा

आप भी खोल सकते हैं जन औषधि केंद्र

बीपीपीआई (ब्‍यूरो ऑफ फार्मा पब्लिक सेक्‍टर यूनिट ऑफ इंडिया) में जरूरी दस्‍तावेज देकर पंजीकरण कराने के बाद कोई भी अपने घर में या किसी अन्‍य स्‍थान पर जन औषधि केंद्र खोल सकता है। फर्म और गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) भी अपने शहर, कस्‍बे या गांव में जन औषधि की दुकान खोल सकते हैं। लेकिन इन केंद्रों पर एक फार्मासिस्‍ट होना जरूरी है, भले ही वह संविदा पर ही क्‍यों न हो। यूपी के नोडल मैनेजर व्रजेश चतुर्वेदी के अनुसार, जो भी जन औषधि केंद्र खोलना चाहता है, उसे आवेदन पत्र के साथ 3100 रुपये का डिमांड ड्राफ्ट, दुकान के स्थान का नक्शा, पैन कार्ड, आधार कार्ड, फार्मासिस्ट के दस्तावेज व उसकी सहमति मुख्‍यालय को भेजनी होगी। दुकान में एक रेफ्रि‍जरेटर की भी व्‍यवस्‍था होनी चाहिए।

केंद्र सरकार की योजना है कि एक साल में उत्‍तर प्रदेश में 3000 जन औषधि केंद्र खोले जाएं। बीपीपीआई दिव्‍यांग व्यक्तियों और अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लोगों को 53,000 रुपये की दवाएं मुफ्त में देती है। इसके अलावा वित्तीय सहायता के रूप में इन दवाओं की बिक्री पर 20% कमीशन भी दिया जाता है। इन केंद्रों को प्रतिस्‍पर्धा से बचाने के लिए बीपीपीआई ने तय किया है कि एक किलोमीटर से कम दूरी पर दूसरा केंद्र नहीं खोला जा सकेगा।



बीपीपीआई के समक्ष चुनौतियां

उत्तर प्रदेश के नोडल मैनेजर, व्रजेश चतुर्वेदी कहते हैं कि प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि योजना को अभी प्रचार और मीडिया के व्‍यापक समर्थन की आवश्यकता है क्योंकि दवा के क्षेत्र में स्‍थापित शक्तिशाली कॉर्पोरेट जगत इस योजना की सफलता में बड़ी बाधा है। उन्होंने बताया कि राजधानी लखनऊ में सिर्फ 4 जन औषधि केंद्र ही खोले जा सके हैं क्योंकि बहुराष्ट्रीय ब्रांडेड कंपनियां सरकारी और प्राइवेट डॉक्‍टरों पर दबाव बनाकर मरीजों को अपनी दवाइयां ही लिखने को बाध्‍य करती हैं। जेनरिक दवाइयां सस्ती होती हैं जबकि जो कंपनियां इन दवाओं को ब्रांड बनाकर बेचती हैं वो महंगी होती है।

उन्होंने कहा कि मरीज किसी भी वैकल्पिक दवा या जेनेरिक औषधि पर भरोसा नहीं करते। डॉक्टरों की निंदा करते हुए व्रजेश ने कहा कि वे जेनेरिक दवाओं की विश्‍वसनीयता पर सवाल उठाकर मरीजों के दिमाग में अनावश्‍यक संदेह पैदा करते हैं जिससे कारण वे इन दवाओं को खरीदने से परहेज करते हैं। व्रजेश ने बताया कि जेनेरिक दवाओं का निर्माण सरकारी प्रयोगशालाओं (एनएबीएल) में किया जाता है। प्रयोगशाला में कई बार जांच के बाद भारत सरकार द्वारा उन्‍हें प्रमाणपत्र जारी किया जाता है।

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छोटे जिलों में बढ़ रहे जन औषधि केंद्र

लखनऊ और अन्य बड़े शहरों की तुलना में छोटे जिले और कस्बे जन औषधि केंद्र के हब के रूप में उभरे हैं। यहां तक कि अमेठी जैसे छोटे से जिले में ही एक दर्जन से अधिक जन औषधि केंद्र खोले जा चुके हैं।

भारत में कहां कितने जन औषधि केंद्र

फिलहाल पूरे देश में एक हजार से अधिक जन औषधि केंद्र हैं। बीपीपीआई इन दवाओं को मोबाइल स्‍टोर्स के माध्यम से भी बेचती है।

जेनेरिक दवा

नोट : इन केंद्रों के बारे में सटीक जानकारी आप www.janaushadhi.com पर जाकर भी पता कर सकते हैं।

क्‍या हैं जेनेरिक दवाएं

जेनेरिक दवा रासायनिक रूप से एक ब्रांडेड दवा की ही समतुल्य है लेकिन इसके निर्माण में आने वाली लागत ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 30-80 फीसदी कम है। एक ब्रांडेड दवा और उसके समतुल्‍य जेनेरिक दवा में एक ही रासायनिक तत्‍व होते हैं और इनकी खुराक, सुरक्षा, इनसे होने वाला फायदा, उपयोग की विधि और गुणवत्ता भी समान होती हैं।



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