छुट्टा जानवर

रोटी देने वाली अब छीनने भी लगी

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  • गलत पॉलिसी का असर या सही तरीके से इम्पलीमेंट नहीं करने का नतीजा, किसानों की खड़ी फसलें खा रहें हैं छुट्टा जानवर
  • जलवायु परिवर्तन, कीड़े, खरपतवार और अब छुट्टा जानवर मिलकर नष्ट कर रहे हैं 50 फीसदी फसल
  • पीलीभीत में तो जंगली जानवरों का भी आतंक, बुंदेलखंड की हालत भी बुरी
  • उत्तर प्रदेश में हैं 483 गौशालाएं, फिर भी गायों की हालत दयनीय
  • दूध नहीं देने पर गायों को यूँ ही छोड़ देते हैं लोग
  • फसल बचाने के लिए दो मुँही कील वाले तार और दूसरे तरीके अपना रहे हैं

सौजन्य त्रिपाठी

गौवंश को मारने पर देश के 20 राज्यों में किसी न किसी का प्रतिबंध है। यूपी में भी गाय के मांस का उपयोग कानूनी रूप से अवैध है। पकड़े जाने पर पांच साल से अधिक की सजा और जुर्माना हो सकता है। ऐसे में दूध देना बंद या कम देने वाली गौवंश के जानवरों को कसाई या स्‍लॉटर हाउस में बेचने की बजाय सड़कों पर यूँ ही खुला छोड़ देते हैं। ये छुट्टा जानवर फसलों को काफी नुकसान पहुँचाते हैं। आवासीय और औद्योगिक क्षेत्रों में भी इनकी वजह से पेड़-पौधों को नुकसान पहुंचता है।

The2is की टीम ने उत्तर प्रदेश में जब इस बारे में पड़ताल की तो पता चला कि छुट्टा गायों, बंदरोंऔरअन्यजानवरोंकी वजह से 15-20% खड़ी फसलें नष्‍ट हो जाती हैं।



नोट : The2is की एक अन्य स्टोरी में हमने बताया है कि ज्यादा दूध के लिए ओक्सीटोसिन के अधिक इस्तेमाल से गायों में न केवल दूध देने की क्षमता कम होती है, बल्कि बांझपन भी बढ़ता है जिससे छुट्टा गायों की संख्या में भी बढ़ोतरी होती है।

किन राज्‍यों में गोमांस पर प्रतिबंध नहीं

केरल, पश्चिम बंगाल, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मेघालय, नगालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम जैसे राज्यों में गाय को मारने पर प्रतिबंध नहीं है।

http://indianexpress.com/article/explained/explained-no-beef-nation/

गाय से क्‍या हैं फायदे और नुकसान? प्रतिबंध क्‍यों?

https://www.quora.com/Despite-India-being-a-secular-country-on-what-background-is-cow-slaughtering-banned

26 अक्‍टूबर 2005 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारतीय संविधान के अनुच्‍छेद 48 के तहत 20 राज्यों में गायों को मारने पर प्रतिबन्ध लगाने के बाद इन राज्‍यों में सभी स्‍लॉटर हाउस बंद कर दिए गए थे। उत्‍तर प्रदेश में तो कानून इतने सख्‍त हैं कि कसाई भी गाय या अन्‍य दुधारू पशुओं के मृत शरीर को नहीं ले जा सकते हैं। भारत में हिन्दुओं द्वारा पूजी जाने वाली गाय को एक शुभ व पवित्र पशु माना जाता है। इनके साथ किसी भी तरह की क्रूरता करना अपराध है और इसके लिए दोषी को जेल भी हो सकती है। हालांकि इन कारणों से बढ़े छुट्टा पशु हजारो की खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

The2is ने सीतापुर, हरदोई, फर्रुखाबाद और शाहजहांपुर के किसानों से इस मसले पर बातचीत भी की। अंतरराष्ट्रीय स्तर की अनुसंधान और विश्लेषण कंपनी, मोर्सलरिसर्चएंडडेवलपमेंटप्राइवेटलिमिटेडकेनिदेशकअतुलेशशुक्ला ने बताया कि लखीमपुर और उसके आसपास के जिलों में तो स्थिति यह है कि जो गायें दूध नहीं दे पातीं वे 5-10 के झुण्ड में खेतों में पहुंचकर गेहूं और धान की तैयार फसलों को बर्बाद कर देती हैं। इसी वजह से 10% – 20% तक फसल ख़राब हो जाती है। एक तरफ जलवायु की वजह से कृषि उत्‍पादन पर बुरी तरह मार पड़ रही  है, वहीं अनिश्चित मौसम के कारण भी कृषि उत्‍पादन 7% प्रभावित होता है। विश्‍वस्‍त सूत्रों के मुताबिक, इस तरह कुल मिलाकर 37% से 50% तक फसल यूँ ही ख़राब हो जाती है, जिससे अर्थव्यवस्था पर होने वाले नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती।

कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक़ पालतू जानवर और कीड़े – मकोड़े भी फसल बरबाद होने के मुख्य कारण हैं। एक सर्वेक्षण से पता चला है कि 15% से 25% फसलें तो इनमें लगने वाले कीड़ों की वजह से ही नष्‍ट हो जाती हैं।

लखीमपुर जिले के खमरिया गाँव के जवाहर लाल शुक्ला ने बताया कि 10-20 के झुण्ड में छुट्टा पशु लगातार गाँव में घूमते रहते हैं। रात में ये खेतों में घुसकर तैयार फसलों को खा जाते हैं या बर्बाद कर देते हैं। जिससे किसानों की मेहनत पर पानी फिर जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि गायों की सुरक्षा जरूरी है लेकिन ऐसे छुट्टा पशुओं के पुनर्वास की उचित व्‍यवस्‍था होनी चाहिए क्योंकि ये पशु न केवल किसानों की फसलों को ही बर्बाद करते हैं।

पीलीभीत का इलाका जंगल से सटा होने के कारण वहां की हालत और भी ख़राब है। जंगली जानवर मुलायम फसलों पर नज़र गढ़ाए रहते हैं।



बल्कि शहरों में इनकी वजह से यातायात भी प्रभावित होता है। ये छुट्टा जानवर सड़कों पर कहीं भी कब्ज़ा जमाकर बैठ जाते हैं, जिससे आने – जाने वाले लोगों को काफी परेशानी होती है। कई बार तो ये जानवर दुर्घटना का भी सबब बन जाते हैं। सब्‍जी मंडी, बाजारों, बस अड्डों और अन्‍य भीड़भाड़ वाले स्‍थानों पर गाय और सांड़ों के जमावड़े से अक्‍सर जाम की स्थिति पैदा हो जाती है। हालांकि लखनऊ नगर निगम सड़क पर घूमने वालों आवारा कुत्‍तों, गायों और सांड़ों के खिलाफ समय-समय पर अभियान चलाता है लेकिन निगम कर्मचारियों का मानना है कि इनको रखने की उचित व्‍यवस्‍था न होने से वे अपने काम को बेहतर ढंग से नहीं कर पाते हैं। नाम न छापने के आश्वासन पर निगम के एक कर्मचारी ने कहा कि यदि किसी का पालतू कुत्‍ता हो तो वह उसे पकड़कर उस पर फाइन भी लगा देगा क्योंकि इससे राजस्व मिलेगा, लेकिन छुट्टा गायों को पकड़ना बोझिल और गैर लाभप्रद है। इसलिए वे इस पर बहुत ध्‍यान नहीं देते।

पशुपालन विभाग, लखनऊ के हेमंत प्रधान बताते हैं कि पशु जनगणना, 2012 (https //data.gov.in/keywords/stray-cattle) के अनुसार, भारत मेंकुल 53 लाख मवेशी हैं जिनमें दूध न देने वाली गायें भी शामिल हैं और 18 लाख आवारा कुत्‍ते हैं। पांच वर्षों में इनकी संख्या लगभग 30 प्रतिशत बढ़ी है।

बंदर, कीट और अनिश्चित जलवायु भी फसलों के लिए नुकसानदेह

उत्‍तर प्रदेश में बंदरों की बढ़ती आबादी को जांचने का कोई प्रभावी तरीका न होने से इनकी संख्‍या में बेतहाशा वृद्धि हुई है और इनकी वजह से राज्य में कृषि उत्पादन को काफी नुकसान हुआ है। निघासन गांव के एक किसान जवाहर लाल शुक्‍ल का कहना है कि खेतों और फार्म हाउसों में लगीं धान, गेहूं और गन्‍ना की फसलों पर झुण्‍ड के रूप में धावा बोलकर बंदर उन्‍हें बड़े पैमाने पर नष्‍ट कर देते हैं। उन्होंने कहा कि 50 से 60 की संख्‍या में आने वाले इन बंदरों को रोका या भगाया नहीं जा सकता क्‍योंकि वे काटने को दौड़ते हैं।

लखीमपुर खीरी के किसान बताते हैं कि बंदर छोटे किसानों की फसलों को बुरी तरह बर्बाद कर देते हैं। उन्होंने बताया कि बन्दर तुरंत उगे पौधों को भी जड़ से उखाड़ कर उन्हें चूसने के बाद फेंक देते हैं और भाग जाते हैं। वे समूह में आते हैं और छोटे – छोटे पौधों के साथ तैयार फसलों को भी बर्बाद कर देते हैं।

छुट्टा जानवर
शिकंजे में फसा हुआ जानवर

खमरिया गांव के ही देशराज लोधी का कहना है कि उन्होंने बंदरों से फसल को बचाने के लिए अबतक कई तरीके अपनाएलेकिन उनका कोई इलाज नहीं है। उन्होंने बताया कि बंदरों को भगाने के लिए गांव वालों ने पटाखों तक इस्तेमाल किया लेकिन आधे घंटे बाद ही वो और ज्यादा गुस्से में वापस आ जाते हैं गांव वालों पर हमला करने से भी नहीं चूकते। माधो पुरवा के सोहन लाल वर्मा बताते हैं कि बन्दर सभी तरह की फसलों का नुकसान करते हैं,चाहे वहगेहूं हो या धान व गन्ने की फसल। उंचा गाँव के शत्रुघ्‍न  लोधी के अनुसार, ‘ऐसा नहीं है कि इन बंदरों को पकड़ने का कोई प्रयास नहीं किया गया, गाँव वालों इन्हें पकड़ने के लिए कांटेदार शिकंजों का भी प्रयोग किया, लेकिन यह बहुत प्रभावी नहीं रहा। ये शिकंजे बंदरों के हाथों या पंजों में फंस जाते थे जिससे खून निकलने लगता था। अगर गाँव के लोगों द्वारा उनका ख्याल न रखा जाए तो उनकी मौत भी हो सकती थी।

जंगली बंदरों के अलावा कीट-पतंगों और चूहों से भी फसलों को बहुत नुकसान होता है। एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश की 15% से 20% तक फसलचूहों और कीट-पतंगों व पालतू जानवरों की वजह से बर्बाद हो जाती है, जबकि अनिश्चित मौसम और जलवायु के कारण करीब 7% फसल बर्बाद होती है।

छुट्टा जानवर
इन तारों में अधिक मात्रा में कीलें लगाते हैं , जिनसे छिल जाती हैं गायें

उत्तर प्रदेश की कुल फसलों की लगभग 35% फसल प्रतिकूल जलवायु की परिस्तिथियों से, जबकि 15% कीड़े – मकोड़ों द्वारा और 10%–15% छुट्टा जानवर नष्ट कर देते हैं।

जबकि बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र की बात करें तो वहां किसान पानी की समस्या के अलावाखेती से जुड़े संसाधनों व यंत्रों जैसे ट्रैक्टर, हल और अन्य उपकरणों की कमी से भी परेशान हैं। वहां की जमीन काफी हद तक पथरीली और कम उपजाऊ है, जिसके कारण यहां के किसान मुख्य रूप से चना, मटर, मसूर, अरहर, अलसी और गेंहूँ आदि की खेती करते हैं। मोर्सेल के अलोक दीक्षित ने जब यहां के किसानों से बात की तो उन्‍होंने बताया कि वे फसलों की 24 घंटे निगरानी करते हैं। अगर उन्‍होंने थोड़ी भी ढिलाई की तो कीटनाशकऔरआवारा पशु लगभग 30-40% फसल बर्बाद कर देते हैं।

डायल 110 यदि कोई भी गाय गंभीर हालत में मिले

गाय या उसके बछड़े को मरने पर जुर्माने के साथ सात साल की सजा हो सकती है। वैसे देखा जाए तो गौ हत्या पर प्रतिबन्ध निःसंदेह एक प्रशंसनीय कदम है। लेकिन इससे इन असहाय मवेशियों को कोई उल्लेखनीय राहत नहीं मिली है। जबकि उत्तर प्रदेश सरकार गौ रक्षा पर बहुत पैसे खर्च कर चुकी है।

छुट्टा जानवर
शिकंजे में फसी लोमड़ी

The2is के संवाददाता सौजन्य त्रिपाठी ने उत्तर प्रदेश गौ आयोग के चेयरमैन अमित त्रिपाठी से इस पर बातचीत की :

उत्तर प्रदेश में गैर – दुधारू गायों की दशा काफी दयनीय है क्योंकि उन्हें डेयरी और घरों से बाहर यूं ही घूमने के लिए छोड़ दिया जाता है।

आयोग निश्चित रूप से गायों को मारने से बचाने और उनके इलाज के लिए समर्पित है।यही कारण है कि हम गैर-कानूनी रूप से नेपाल या पश्चिम बंगाल ले जाई जा रही गायों पर नजर रखते हैं। जब भी ऐसी कोई जानकारी मिलती है तो हम स्‍थानीय पुलिस को सूचित करते हैं और वह तत्‍काल कार्रवाई कर पशुओं की तस्‍करी में शामिल लोगों को गिरफ्तार करती है।

सवाल : आपका संगठन छुट्टा जानवरों के लिए क्या कर रहा है?

उत्तर : हम लोग दूध देने और दूध देना बंद करने वाली सभी गौवंश के जानवरों की सुरक्षा करते हैं। यूपी में 483 गौशालाएं हैं जहाँ इनकी व्यवस्था की गयी है कि गायों के मूत्र को इकठ्ठा किया जाए। पिछले बजट में गायों की सुरक्षा के लिए 5 करोड़ 16 लाख का बजट निर्धारित किया गया था। गौमूत्र की बावलिंग करके आयुर्वेद इस्तेमाल के तैयारी की जा रही है। यूपी के 75 जिलों की इन गौशालाओं में 4-10 हज़ार गएँ रह रही हैं। कई धार्मिक संगठन भी इसमें मदद कर रहे हैं।

सवाल : आम आदमी गौ रक्षा के मकसद से संपर्क करना चाहते हैं तो कैसे करें?

उत्तर : 100/108  नंबर की तरह हमारा टोल फ्री नंबर है 110. इस नंबर पर कॉल करके गौवंश की त्रफ्फिसिंग, उन्हें मारने या क्रूरता की रिपोर्ट कर सकते हैं।

सवाल : लेकिन कुछ गाय मालिक ही गायों को खुला छोड़ देते हैं और वे यहाँ – वहां कूड़ा खाती रहती हैं और कभी – कभी जख्मी भी हो जाती हैं।

उत्तर : बुंदेलखंड और लखनऊ में ऐसी चीज़ें देखने को मिली हैं कि जन गाय दूध देना बंद कर देती हैं तो मालिक उन्हें खुला छोड़ देते हैं। हमारी नाज़र ऐसी गायों पर भी रहती है और उन्हें गौशाला में पहुँचाने का प्रयास रहता है।

सवाल : कई जगहों पर छुट्टा जानवरों की समस्या बढ़ती जा रही है। ये फसलों को काफी नुकसान पहुंचा रहें हैं। क्या इस समस्या से निपटने की कोई योजना है?

उत्तर : मैं जानता हूँ कि ये बड़ी समस्या है। अगर किसानों को छुट्टा जानवरों से कोई नुकसान होता है तो जिला प्रशासन को रिपोर्ट करें। अगर वहां से कोई मदद नहीं मिलती है तो 0522-2740010 पर कॉल करके हमें बता सकते हैं। 5 करोड़ 16 लाख के बजट के मदद से चार कमर्शियल गौशाला बनवाने ई तैयारी है। यहाँ पर दवाओं के लिए गौमूत्र की पैकेजिंग की जाएगी।



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