शौचालय नहीं दुल्हन नहीं

शौचालय पर नहीं चलती दुल्हन की

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नीति विश्‍लेषण

अनुवाद : धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी

♦ हरियाणा की योजना ‘ शौचालय नहीं दुल्हन नहीं ‘ का लोगों पर असर नहीं

♦ दुल्हन नहीं डाल सकती है दबाव

♦ पुरुष करते हैं ज्‍यादातर बड़े फैसले

♦ दुल्‍हन के तौर-तरीकों का भी पड़ता है असर

♦ जागरूकता कार्यक्रमों का कुछ खास असर नहीं

शौचालय नहीं तो दुल्हन नहीं’ – 2005 में हरियाणा सरकार ने खुले में शौच को खत्म करने के लिए एक नया प्रयोग शुरू किया था। ऐसा माना गया कि यह प्रयोग दूसरे राज्‍यों के लिए मिसाल बनेगा। सरकार ने योजना का प्रचार-प्रसार भी खूब किया लेकिन दुर्भाग्य से  इस योजना का असर आम लोगों पर ना के बराबर रहा।



यूके के वैज्ञानिकों ने इस योजना पर एक अध्‍ययनन के बाद यह दावा किया है। * ब्रिटा ऑग्सबर्ग और पॉल रॉड्रिग्‍ज लेम्स ने हरियाणा के इस अभियान को ग्‍वालियर (मध्य प्रदेश) की शहरी झुग्गी आबादी व उसके आसपास के गांवों और तमिलनाडु के तिरुवरूर जिले की एक ग्रामीण आबादी में दोहराया।

इस अध्ययन में उन्होंने मूल रूप से दो सवालों के उत्तर ढूंढने की कोशिश की : पहला, साफ-सफाई के लिए लोग कौन सा तरीका अपनाते हैं ? और दूसरा, खुले में शौच को बंद करने की योजना को गति देने के लिए किस तरह नीतियां तैयार की जाएं? इसके लिए शोधकर्ताओं ने 2009/10 और 2014/15 में कार्यक्रम के दौरान डेटा एकत्र किया और उसकी घरों की विशेषताओं से तुलना की।

प्राय: यह देखने में आया कि जब लोगों के पास कम पैसा होता है तो वे निजी शौचालय बनवाने में कम रुचि दिखाते हैं लेकिन जैसे-जैसे उनकी आर्थिक स्थिति सुधरती है, उनकी इस प्रवृत्ति में सीधे तौर पर बदलाव देखने को मिला है। वैसे पैसे की कमी ही शौचालय निर्माण में अकेली बाधक नहीं है।

♦ होने वाली शादियां और आने वाली दुल्‍हन के तौर-तरीके भी ग्रामीण भारत में शौचालय के निर्माण में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

♦ केवल सेहत और साफ-सफाई की जागरूकता फैलाने के कार्यक्रमों से ही ही खुले में शौच को खत्‍म नहीं किया जा सकता।

♦ हां, अगर गांव वालों से यह कहा जाता है कि शौचालय से हैसियत बढ़ती है तो ये बात उनको जल्‍दी समझ में आती है।

पैसे की कमी दूर होने पर शौचालय बनवाने की संभावना अधिक

नीचे दी गई टेबल में दो सर्वेक्षण के दौरान तिमाही आमदनी के आधार पर घरों में शौचालय बनवाने के प्रतिशत को दर्शाया गया है। पहले दौर के सर्वेक्षण में हम देखते हैं कि शौचालय के निर्माण में उतार-चढ़ाव दिखाई देता है। वहीं दूसरे दौर के सर्वेक्षण में समय के साथ-साथ यह बदलाव दिखाई देता है कि गरीब परिवार शौचालय बनवाने में अपेक्षाकृत अधि‍क दिलचस्‍पी दिखा रहा है।

शौचालय नहीं दुल्हन नहीं
चित्र 1  – शौचालय का प्रतिशत और आय

नोट : पहले राउंड में 3,196 और दूसरे राउंड में 3580 घरों को शामिल किया गया है।

गैर-वित्तीय बाधाएं : शादी शौचालय निर्माण को कैसे प्रभावित करती है

वैसे तो पैसे की कमी शौचालय न बनवा पाने में एक महत्वपूर्ण कारण है, लेकिन यही इकलौता कारण नहीं है। एक विश्लेषण से यह भी पता चलता है कि सेहत और साफ-सफाई के जागरूकता अभियान खुले में शौच को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। शोध में पता चलता है कि इसकी बजाय इसे लोगों की हैसियत और सामाजिक गतिशीलता से जोड़ दिया जाए तो यह तरीका ज्‍यादा कारगर हो सकता है। यानी कि लोगों को बताया जाए कि घर में शौचालय होना समाज में सम्‍मान की बात है तो शायद लोग ज्‍यादा बेहतर ढंग से समझ सकेंगे।

हरियाणा के अभियान के मद्देनजर  किए गए अध्ययन से यह साबित होता है कि किसी घर में निकट भविष्‍य में होने वाली शादी और दुल्‍हन के तौर-तरीकों से भी लोग शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित होते हैं। जिन घरों में शादी लायक लड़के मौजूद होते हैं, वहां शौचालय निर्माण की संभावना ज्‍यादा होती है।

चित्र 2  में  दिखाया गया है कि कैसे समय और परिस्थिति के साथ-साथ बचत, आय और जाति जैसे कारक शौचालय बनवाने की दर को प्रभावित करते हैं। अभी हम केवल ऐसे घरों को शामिल कर रहे हैं जिनमें 12-24 वर्ष की उम्र के बच्‍चे रहते हैं। हम पाते हैं कि जिन घरों में विवाह योग्य आयु वाली लड़कियां हैं,  उनकी अपेक्षा ऐसे घरों में शौचालय बनवाने की दर में वृद्धि देखने को मिली जहां विवाह योग्य आयु के लड़के हैं।

विश्लेषण से यह साबित होता है कि शादी करने योग्य आयु वाले लड़कियों वाले घरों की तुलना में लड़कों की शादी की संभावनाओं वाले घरों में शौचालय निर्माण की संभावना दस प्रतिशत अधिक है।



शौचालय नहीं दुल्हन नहीं
चित्र 2 – बच्‍चों की उम्र और घरों में शौचालय निर्माण

नोट : (i) 11 से 24 साल के बच्चों वाले घरों में शौचालय निर्माण का औसत प्रतिशत  (ii) पुरुषों वाले 1,110 महिलाओं वाले  734 घरों की जांच की गई।

सामाजिक स्थिति पर जोर देने से खुले में शौच का उन्‍मूलन संभव

इस अध्ययन से पता चलता है कि भारत में स्वच्छता अपनाने के फैसले न केवल स्वास्थ्य संबंधी विचारों से संचालित होते हैं बल्कि संभावित आर्थिक लाभों का भी ऐसे फैसलों पर असर पड़ता है। इनमें सामाजिक स्थिति, घर की कीमत के साथ-साथ बेटों की बेहतर शादी के विचार भी शामिल हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि एक ऐसे समाज में जहां बड़े वित्तीय निवेश करने के निर्णय आम तौर पर पुरुष करते हैं, उन्‍हें स्‍वच्‍छता के लाभों को समझाना जरूरी है, तभी खुले में शौच की प्रथा को पूरी तरह खत्म करने के लक्ष्‍य को हासिल किया जा सकता है।

 * ब्रिटा ऑग्सबर्ग इंस्‍टीट्यूट ऑफ फिस्‍कल स्‍टडीज सीनियर रिसर्च इकोनॉमिस्‍ट और पॉल रॉड्रिग्‍ज लेम्स यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन में शोधार्थी हैं।



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