घरेलू शराब

असम,जहाँ गांव-गांव बनती है शराब

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30 से 40 प्रतिशत लोग घरेलू शराब बनाने के काम में

सड़े हुए चावल में जहरीली वनस्पतियाँ मिला कर बनाते हैं और नशीला

लोगों का मानना है कि इसे पीने से सेहत अच्छी रहती है

शैलेन्द्र कुमार

निज घरुआ गाँव

असम के निज घरुआ गाँव में कंपनी के काम से मेरा आना हुआ, तो हमेशा की तरह फील्ड वर्क करते दोपहर होने को आयी, साथ ही  लगी जोर की भूख ! थोड़ी दूर और चलने पर देखा कि एक महिला बड़े से बर्तन में चावल पका रही है | खुशी – खुशी जब उस महिला तक पहुंचा तो पता लगा कि वो उस चावल से शराब बना रही थी |

हम जिस गाँव की बात कर रहे हैं, वह असम की राजधानी गुवाहाटी से करीब 95 किलोमीटर दूर है। यहां से ब्रहमपुत्र नदी करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर है, इसके बावजूद यहां साफ़ पानी की बहुत समस्या है। इसका कारण है कि यह इलाका मुख्यतः भूजल पर निर्भर है जो आर्सेनिक एवं अन्य रसायनों  से  दूषित है। इसके अतिरिक्त जल में  फ्लोराइड की अत्यधिक मात्र भी है|(https://sites.google.com/site/assamdevelopmentinitiatives/home/drinking-water-in-assam).

ये इस इलाके में आम बात है

यह अकेले केवल इस गाँव की ही बात नहीं है, लगभग हर गाँव में 30 से 40 प्रतिशत लोग घरेलू शराब बनाने के काम में लगे हैं। इस शराब का इस्‍तेमाल अपने लिए करने के साथ ही साथ वो इसे बेचकर घर का कुछ खर्च भी निकाल लेते हैं। इस गांव में लगभग सारे घर घांस-फूस के बने थे और एक या दो घर ही पक्के बने होंगे।गांव के घरों में पुरुष कम ही मिलते हैं क्योंकि रोजगार की तलाश में वो पलायन को मजबूर हैं|



असम

ऐसे बनाई जाती है घरेलू शराब

पहले चावल को उबाला जाता है, फिर उसे ठंडा करके फैला देते हैं। 2 से 3 दिन के लिए इसे ऐसे ही छोड़ दिया जाता है जब तक कि इसमें से बदबू न आने लगे या सड़ न जाए। इसके बाद सड़े हुए चावल में स्‍थानीय स्‍तर पर पाई जाने वाली कई वनस्पतियाँ मिलाते हैं, जैसे – ढेकिया, नागोल, माँगा, बहागा, धतूरा और बिह्लोंगी। ये सब नशा बढ़ाने का काम करती हैं। लोगों ने बताया कि ये वनस्पतियाँ जहरीली होती हैं और इनको खाने के बाद आदमी मर भी सकता है, इसके बावजूद लोग इसको शराब में मिलाकर पीते हैं।

इसे बनाने में 50 से 60 रुपए का खर्च आता है और 60 मिलीलीटर शराब का दाम होता है 10 रूपए|

अलगअलग राय, अलग अलग नाम…

इस देशी शराब को पीने के बारे में पूछने पर लोगों की अलग-अलग राय सामने आई। कुछ लोगों ने बताया कि इसको पीने से उनका स्वास्थ्य ठीक रहता है तो वहीं कुछ लोगों का कहना था कि यह उनका पारम्परिक पेय पदार्थ है। कुछ लोगों ने बताया कि उनके पास विदेशी शराब पीने के पैसे नहीं हैं इसलिए मजबूरी में वे इसी से काम चलाते हैं। कुछ ऐसे भी थे जिन्‍होंने कहा कि वे अपनी थकान दूर करने के लिए इसका सेवन करते हैं। लेकिन अधिकतर लोगों का मानना था कि इसे पीने से उन लोगों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है और वे लोग दिन भर काम के प्रति सक्रिय रहते हैं।

घरेलू शराब को कई नामों से जाना जाता है, जैसेसुलाई, छंग, चौक और हाडिया। हालांकि असम में इसका सबसे ज्‍यादा प्रचलित नाम सुलाई है। जब हमने लोगों से पूछा कि आप लोग इस बात को जानते हैं कि ये जहर है, इसके बावजूद क्यों पीते हैं? उन्होंने कहा कि किसी भी पदार्थ को अगर सीमित मात्रा में पिया जाए तो वह जहर नहीं रह जाता है और इसकी आदत हो जाने के कारण यह नुकसान भी नहीं करता है।

ढेकिया

कानून व्यवस्था

यह तो ज़ाहिर है कि शराब बनाने का धंधा अवैध है, पर फिर भी चलता है| पुलिस के सहयोग से ही। जब कभी ऊपर से दबाव बढ़ता है तो छापा पड़ना शुरू हो जाता है वरना तो असम में घर-घर बड़ी सहूलियत से यह धंधा जारी है|

राज्य सरकार द्वारा 2015 में महीने का पहला एवं अंतिम दिन ड्राई डे (शराब रहित) घोषित किया गया, परन्तु 31 दिसम्बर इसमें शामिल नहीं है।

घरेलू शराब

घरेलू शराब

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राज्यवार शराब की खपत

राज्‍य में प्रति व्‍यक्ति/सप्‍ताह शराब की खपत (मिलीलीटर में) 2011-12 के आंकड़ों के अनुसार



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: http://www.dailymail.co.uk/news/article-2908876/Bootleg-alcohol-kills-28-hospitalises-160-Lucknow-India.html


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