पवित्र ही नहीं, रोटी भी देती है गाय

पवित्र ही नहीं, रोटी भी देती है गाय

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  • पवित्र ही नहीं, रोटी भी देती है गाय
  • इस बहस में कूदे विदेशी भी
  • लन्दन के वैज्ञानिकों का दावा, कई फायेदे हैं गाय पालने के

भारत में गाय हमेशा बहस का एक मुद्दा बनी रही है। लोग गाय क्यों पालते हैं ? क्या सिर्फ इसलिए कि ये पवित्र है या इसके कई और फायेदे है या फिर इसलिए कि ये किसी घर की रोटी भी चला सकती है।

इस बहस में अब विदेशी शोधकर्ता भी कूद गए हैं। 2013 में एनालोग, इटांग और करनाल ने अपने शोध में दावा किया कि पशुपालन कोई फायेदा का धंधा नहीं है। फिर  2014 में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में *प्रो. ओरेजियो अट्टानसियो और डॉ. ब्रिटा ऑग्‍सबर्ग ने उनके दावे को चुनौती दी और इसके सबूत में पूरे तीन साल का डेटा भी दिया।



शोधकर्ताओं ने ग्रामीण भारत में किसानों द्वारा गाय और भैंस पालन के पीछे अर्थव्यवस्था की दिलचस्प व्याख्या की है। उन्‍होंने बदलते मौसम,  दुग्ध उत्पादन और  घरेलू आय को ध्‍यान में रखते हुए पशुपालन से होने वाले लाभ और नुकसान पर प्रकाश डाला है।

उनकी रिपोर्ट आंध्र प्रदेश के एक जिले अनंतपुर से एकत्रित तीन साल के आंकड़ों पर आधारित है। रिपोर्ट यह दर्शाती है कि इन तीन सालों में से एक साल गाय पालन से होने वाली आमदनी अनुकूल मौसम की वजह से बहुत अधिक थी जबकि बाकी दो साल सूखा पड़ा था इसलिए इस दौरान हुई आमदनी कम थी।

व्‍यापक सर्वेक्षण

आंध्र प्रदेश के 23 जिलों में से अनंतपुर सबसे बड़ा जिला है। दक्षिण भारत का यह ऐसा क्षेत्र है, जहां बहुत कम वर्षा होती है। यहां की मिट्टी भी बहुत खराब है और अक्सर सूखे की स्थिति रहती है।

व्‍यापक सर्वेक्षण के लिए 2008 में कुल 1,041 घरों का चयन किया गया था और इसके अंतर्गत विभिन्‍न श्रेणियों में जानकारियां एकत्र की गई थीं। वर्ष 2009 में फिर से इन्‍हीं घरों में संपर्क किया गया और उन 1041 घरों में से  951 घरों में पहले की ही तरह दोबारा सर्वेक्षण किया गया। वर्ष 2012 में एक अंतिम सर्वेक्षण किया गया जिसमें 885 घरों में फिर से साक्षात्कार किया गया।

टेबल 1: घरों में पशुओं की संख्‍या

पवित्र ही नहीं, रोटी भी देती है गाय

आमदनी

गाय पालन से एक गरीब घर में मुख्य रूप से तीन प्रकार से राजस्व प्राप्त होता है।

  1. दूध उत्पादन की मात्रा- जिसे या तो बेच दिया जाता है या उसकी घर में ही खपत होती है।
  2. पशुओं के गर्भाधान से जो बछड़े पैदा होते हैं, ज्‍यादातर मामलों में किसानों को उनकी बिक्री से कोई राजस्व नहीं मिलता है, लेकिन कुछ किसान उन्‍हें बेचकर पैसे कमाते हैं।
  3. गोबर या उपलों की बिक्री से, जिसे ईंधन के रूप में इस्‍तेमाल किया जाता है।

लागत

  1. पशुओं के चारे की व्‍यवस्‍था करने में सबसे अधिक खर्च आता है।
  2. उनके स्‍वास्‍थ्‍य की देखभाल, जिसमें गर्भाधान भी शामिल है।
  3. पहाड़ी से पशुओं के गिरने के कारण (ज्‍यादातर मामलों में उनकी मौत हो जाती है) पशुपालकों को नुकसान उठाना पड़ता है, हालांकि पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़कर देश के दूसरे हिस्‍सों में ऐसा नहीं होता है।
  4. पशुओं की देखभाल में मजदूरों पर होने वाला खर्च।

टेबल 2:



पवित्र ही नहीं, रोटी भी देती है गाय
नोट : कॉलम (1) – (3) गाय पालन पर होने वाली आमदनी की औसत दर, जबकि कॉलम 4 में *एईके (एनागोल,  इटांग और करलान) की रिपोर्ट के आंकड़ों को दर्शाया गया है। इस तालिका का पहला कॉलम आमदनी और पशुओं के मूल्य को दर्शाता है; जबकि दूसरा कॉलम आमदनी को। तीसरा कॉलम लागत और आमदनी को दर्शाता है। तालिका के आखिरी दो कॉलम पहले केवल हमारे डेटा और मान्यताओं का उपयोग करके और फिर एईके के आंकड़ों के आधार पर आमदनी की दर और मजदूरों पर होने वाले खर्च को दर्शाते हैं। ये सभी आंकड़े वर्ष 2008 की मुद्रास्फीति के आधार पर तैयार किए गए हैं।

विभिन्‍न वर्षों के आंकड़ों में इतना अंतर क्‍यों

जैसा कि ऊपर दी गई तालिका से स्‍पष्‍ट है कि 2008 इकलौता ऐसा साल था जब किसान को आर्थिक रूप से लाभ हुआ और 88% आमदनी हुई, वहीं दूसरी ओर बाकी दो सालों में उन्‍हें घाटा उठाना पड़ा। 2009 में आमदनी घटकर –74% और 2012 में -57% रह गई जबकि इसमें मजदूरी पर होने वाला खर्च भी शामिल नहीं था।

इसका कारण है, अनंतपुर बारिश पर बहुत ज्‍यादा निर्भर है : वर्ष 2008 में सही समय पर और प्रचुर मात्रा में बारिश हुई थी, जबकि 2009 को आधिकारिक तौर पर सूखे वाला साल घोषित किया गया था। इसी प्रकार 2012 में भी औसत बारिश कम होने से किसानों को बहुत अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। ऐसे सूखे वाले वर्षों में चारा कम निकलता है और महंगा भी मिलता है। ऐसे में गायों को पर्याप्‍त मात्रा में भोजन नहीं मिल पाता है और इसका परिणाम होता है कि गाय दूध बहुत कम देती हैं और दूध देना भी जल्‍दी बंद कर देती हैं। इसके अलावा पशुओं में गर्भधारण भी कठिन हो जाता है, जिससे दुग्ध उत्पादन की संभावना कम हो जाती है। ऐसे में पशुओं के बीमार होने और उनकी मौत का खतरा भी अधिक होता है। इसका नतीजा किसान को घाटे के रूप में उठाना पड़ता है।

निष्‍कर्ष

शोधकर्ताओं ने अपने निष्कर्ष में कहा है कि उनका शोध यह साबित नहीं करता है कि पशुपालन करने वाले भारतीय किसानों का व्यवहार सही है। इसका मतलब यह भी नहीं है कि गायों को सांस्कृतिक और धार्मिक कारणों के अलावा व्यापार के उद्देश्‍य से नहीं रखा जा सकता है। वास्‍तविकता यह है कि हम आर्थिक लाभ के लिए गाय पालने का विकल्‍प भी चुन सकते हैं।

* प्रो. ओरेजियो अट्टानसियो दि इंस्‍टीट्यूट ऑफ फिस्‍कल स्‍टडीज, लंदन के शोध निदेशक और डॉ. ब्रिटा ऑग्‍सबर्ग इस संस्‍थान की वरिष्‍ठ अनुसंधान अर्थशास्‍त्री हैं।



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