बीट इट, जस्‍ट बीट इट

गाना सुनें और भगाएं परीक्षा का डर

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माइकल जैक्‍सन ने दशकों पहले गाना गाया था – ‘बीट इट, जस्‍ट बीट इट….’। एक्‍जाम फीवर को हराने के लिए शायद ये गाना ही सही है। परीक्षा का समय चल रहा है और लगभग हर घर में इसका असर देखा जा सकता है। बच्‍चे तो बच्‍चे, माता-पिता और परिवार के दूसरे सदस्‍य भी चिंता में घिरे दिखाई देते हैं। यह बिल्‍कुल भी ठीक नहीं है। लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के मनोविज्ञान विभाग के प्रो. विवेक अग्रवाल बताते हैं इससे निपटने का तरीका – ‘पढ़ाई तो करें, लेकिन साथ ही बच्‍चे को संगीत के मजे भी लेने दें।‘

सौजन्‍य त्रिपाठी / अनुवाद : धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी

बीट इट, जस्‍ट बीट इट
प्रो. विवेक अग्रवाल

परीक्षा नजदीक आते ही बच्चों का चिंतित और तनावग्रस्‍त हो जाना एक सामान्‍य बात है लेकिन वास्‍तव में यह तनाव इतना अधिक हो जाता है कि पूरे परिवार को अपनी चपेट में ले लेता है। इसका प्रमाण यह है कि एक बार परीक्षा खत्‍म होने के बाद पूरा परिवार चैन की सांस लेता है, जैसे कितना बड़ा बोझ उसके सिर से उतर गया। हालांकि कभी-कभी जब छात्र तनाव से निपटने में सफल नहीं हो पाता और अनावश्यक रूप से चिंतित रहने लगता है तो यह धीरे-धीरे बीमारी का रूप ले लेता है। इससे न केवल छात्र का प्रदर्शन प्रभावित होता है बल्कि यह उसके पूरे व्यक्तित्व पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है।



प्रो. अग्रवाल अफसोस जताते हैं, ‘इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि परीक्षा का डर केवल बच्चों तक ही सीमित नहीं रहता है बल्कि उनके माता-पिता भी इसकी जद में आ जाते हैं। समाज में गला काट प्रतिस्पर्धा को देखते हुए वे अपने बच्चों को इस बात के लिए मजबूर करते हैं कि वे जितनी देर जाग रहे हैं उस दौरान पूरा समय पढ़ाई ही करें। यही नहीं, अपने सोने के समय में भी कटौती करें। प्रो. अग्रवाल कुछ और टिप्स भी देते हैं।

बीट इट, जस्‍ट बीट इट

परीक्षा को भूत की तरह हौवा न बनाएं। बच्‍चे प्रकृति से काफी सजग होते हैं और जब वे यह महसूस करते हैं कि उनके माता-पिता में परीक्षा को लेकर घबराहट है तो उन्हें लगता है कि यह जरूर कोई डरने वाली बात है! परिवार के सभी वरिष्‍ठ सदस्‍यों का कर्तव्य है कि वे बच्‍चों को समझाएं कि पढ़ाई भी जीवन का ही एक हिस्‍सा है, कोई अलौकिक चीज नहीं है। पढ़ाई के दौरान थोड़ा समय निकालकर बच्‍चों को उनके शौक के लिहाज से खेलने, टीवी देखने, संगीत सुनने और अपनी रुचि की अन्‍य चीजें पढ़ने के लिए प्रोत्‍साहित करना चाहिए।

संगीत से मिलता है आराम : प्रो. अग्रवाल कहते हैं, कई शोध से यह साबित हो चुका है कि संगीत हमारे स्‍नायु तंत्र को शिथिल कर राहत पहुंचाता है। वे कहते हैं – काउंसलिंग के लिए मेरे पास आने वाले युवाओं को मैं हमेशा सलाह देता हूं कि पढ़ाई के समय वो संगीत सुनने से परहेज न करें क्‍योंकि यह पढ़ाई पर ध्‍यान केंद्रित करने में सहायक है। आपके माता-पिता जो भी सोचते हैं, आप उसकी परवाह न करें। माता-पिता भी यह सुनिश्चित करें कि आपके बच्‍चे को सोने का पर्याप्‍त समय मिले। देर रात तक बच्चे पर पढ़ने का दबाव डालने से उसके प्रदर्शन में सुधार नहीं होगा। जो बच्चा रात में अच्छी तरह से सोया होगा, सुबह वही एक अच्‍छे छात्र के रूप में परीक्षा के लिए तैयार होगा! साथ ही, बच्‍चों को उनकी पसंद का खाना दें, इससे वह अपने को सहज व खास महसूस करेगा और यह उसकी शारीरिक और मानसिक क्षमता को बढ़ाने में भी सहायक होगा।



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आत्‍महत्‍या के प्रमुख कारण (वर्ष 2013)

आत्‍महत्‍या का एक सामान्‍य कारण बोर्ड परीक्षाओं में, खासकर 12वीं की परीक्षा में, अच्‍छा परिणाम लाने के लिए माता-पिता का दबाव है। चूंकि ये बोर्ड परीक्षाएं ही कॉलेज में प्रवेश और उसके बाद रोजगार के अवसरों का निर्धारण करने का आधार होती हैं इसलिए 16-18 साल के ऐसे छात्रों पर अक्‍सर इन परीक्षाओं में सफल होने का अनावश्‍यक दबाव रहता है। जब वे ऐसा नहीं कर पाते हैं तो उनके सामने आत्महत्या करने के अलावा कोई और रास्‍ता नहीं होता। वर्ष 2013 में ही आत्‍महत्‍याओं के 2,471 ऐसे मामले सामने आए, जिनमें परीक्षा में विफलताको इसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया था।

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आयु के आधार पर आत्‍महत्‍या की दर

जैसा कि ऊपर दिए गए ग्राफ से स्पष्ट है, 15-29 वर्ष आयु वर्ग में पुरुष व महिलाओं में समान रूप से आत्महत्या की दर सबसे अधिक है। इस ग्राफ से हम अनुमान लगा सकते हैं कि यह ऐसा आयु वर्ग है जिसमें आत्‍महत्‍या करने वालों में हाई स्‍कूल से ऊपर की कक्षा के छात्रों की संख्या सबसे अधिक है।

वास्‍तव में बच्‍चों को बिना समझे उन्‍हें विषय को रटने पर जोर देने की बजाय, बच्‍चों में विषय के प्रति जिज्ञासा पैदा करना ज्‍यादा जरूरी है। साथ ही बच्‍चों को इस बात के लिए प्रोत्‍साहित करें कि वे अपनी समस्याएं आपके साथ साझा करें।  बच्‍चों को दिलचस्प उदाहरणों के जरिए विषयों को समझने में आप उनकी मदद कर सकते हैं।

माता-पिता यदि इस तरह का दृष्टिकोण अपनाते हैं तो बच्‍चों को परीक्षा में सफलता दिलाने के साथ-साथ उन्‍हें जीवन में सफल होने के लिए भी यह दूरगामी सिद्ध होगा।



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