तबाही की ओर ले जाती गन संस्‍कृति

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सीरत फातिमा.  अनुवाद – धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी

बंदूकों के लाइसेंस जारी किए जाएं या नहीं। ये भारत समेत कई देशों में बड़ा मुद्दा है. एक ओर अमेरिका में बंदूक लेने की प्रक्रिया सबसे उदार है, जबकि भारत में लाइसेंस देने की एक कड़ी प्रक्रिया है और पिछले साल जुलाई में इसे और भी सख्‍त कर दिया गया है। लेकिन क्‍या ये कानून इस तरह की घटनाओं को रोकने या कम करने में सक्षम हैं?

अमेरिका में आए दिन अंधाधुंध फायरिंग की घटनाएं सुनाई देती हैं तो भारत में भी हर्ष फायरिंग या जश्न व उत्‍सव के दौरान हवाई फायरिंग की बात आम हो गई है और इसमें मरने वाले बेगुनाहों की संख्‍या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। आइए नजर डालते हैं the2Is द्वारा किए गए एक तुलनात्मक विश्लेषण पर :

जून 2016 में जब संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख अमेरिकी प्रशासन  को उनके यहां लगातार हो रही फायरिंग की घटनाओं से अपने लोगों की रक्षा करने की प्रतिबद्धता की याद दिला रहे थे, उसी समय भारत अपने यहां पहले से ही कड़ी बंदूक नियंत्रण नीति को और सख्‍त बनाने की तैयारी कर रहा था। बंदूक रखने की नीति पर पर्याप्‍त नियंत्रण न होने के कारण अमेरिका में हाल के दिनों में फायरिंग की घटनाओं में बहुत तेजी से बढ़ोतरी हुई है। वहां फायरिंग की घटनाएं सुर्खियों में हैं।



एक तरफ जहां दुनिया अमेरिका में फायरिंग की घटनाओं में बड़ी संख्‍या में बेगुनाहों के मारे जाने पर अफसोस जता रही थी और बन्दूक कानून में संशोधन की बात कर रही थी, वहीं दूसरी ओर भारत में बिना वजह ऐसी फायरिंग की घटनाओं में लोग मारे जा रहे थे, जो किसी उत्‍सव या समारोह में आम बात हो गई है। और ऐसा तब हो रहा है जब हमारे यहां गन लाइसेंस लेने की प्रक्रिया दुनिया के अन्‍य देशों की तुलना में काफी कठिन है।

भारत में हथियारों की नई नियमावली जुलाई 2016 से लागू हुई है, जिसे पहले से और सख्‍त बनाया गया है। हालांकि बंदूक के पक्षधर और  खेल समर्थक इसका विरोध कर रहे हैं। अपनी दो जवान बेटियों के साथ बंदूक के खेल के प्रति समर्पित राणा मोहन व्‍यथित होकर कहते हैं, ‘यह सोचना भी हास्‍यास्‍पद लगता है कि अब हमें एयर गन्‍स और पेंटबाल्‍स के लिए लाइसेंस लेना पड़ेगा। वास्तव में सरकार क्या करने की कोशिश कर रही है, हिंसा पर रोक लगाने की या खेल पर अंकुश लगाने की?’

हालांकि यह अकारण नहीं है। यदि हम भारत में आग्नेयास्त्रों से होने वाली मौतों के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2015 में इनमें से केवल 10 प्रतिशत लोग और 2014 में 14 प्रतिशत लोग ही लाइसेंसी हथियारों से मारे गए थे। बाकी लोग अवैध हथियारों से मारे गए थे जो देश भर में आसानी से मिल जाते हैं। एक अनुमान के अनुसार, भारत की 1.2 अरब से अधिक की आबादी में करीब 4 करोड़ आग्‍नेयास्‍त्र हैं, लेकिन इनमें से मात्र 63 लाख आग्‍नेयास्‍त्र ही लाइसेंसी हैं। इसके विपरीत संयुक्त राज्य अमेरिका में लगभग हर व्यक्ति के पास एक बंदूक है। इस प्रकार वहां कुल लगभग 31 करोड़ बंदूकें हैं!



इंडिया स्‍पेंड नामक संगठन ने बंदूक नियंत्रण के आंकड़ों का विश्‍लेषण करने के बाद कहा है कि एक भारतीय की तुलना में एक अमेरिकी के इन हथियारों से मारे जाने की संभावना 12 गुना अधिक है। लेकिन वास्तव में क्या हो रहा है?  क्‍या ये कड़े कानून देश को सुरक्षित बना रहे हैं? इस विषय पर कुछ अध्ययन चल रहे हैं लेकिन अभी ये आधे-अधूरे हैं। हालांकि फरवरी 2016 में Epidemiologic Reviews में छपे एक ताजा अध्‍ययन में दुनिया भर में बंदूक कानूनों और हिंसा पर हुए अध्ययनों का विश्लेषण कर निष्कर्ष निकालने का प्रयास किया गया है। इससे पता चलता है कि बंदूक की खरीद पर नए प्रतिबंध लगाने के बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि आग्नेयास्त्रों से होने वाली मौतों में कमी आएगी ही।’

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हवाई फायरिंग भी गैरकानूनी

भारतीय कानून के अनुसार हवाई फायरिंग करना भी अवैध है, भले ही वह लाइसेंसी हथियार से की गई हो। पूरी दुनिया में खुशी के मौकों पर हवाई फायरिंग करना कोई नई बात नहीं है लेकिन भारत में इसका प्रचलन कुछ ज्‍यादा ही है। त्‍योहारों और शादियों के अलावा चुनाव में जीत के बाद हवाई फायरिंग की घटनाएं आम हो गई हैं। ऐसे मौकों पर लोग अपनी खुशी में इतने तल्‍लीन हो जाते हैं कि फायरिंग करते समय इस बात पर उनका ध्‍यान ही नहीं रहता कि वे कहां फायरिंग कर रहे हैं। ऐसे में कई बार अप्रिय घटनाएं हो जाती हैं और मासूम और बेगुनाह लोगों की जान चली जाती है।

हवा में फायरिंग से भी जा सकती है जान

राजस्थान में पिछले वर्ष हवाई फायरिंग के बाद एक गोली हवा में ऊपर जाने के बाद गुरुत्वाकर्षण के कारण उतनी ही तेजी से वापस लौटी और एक व्यक्ति के कंधे में लग गई। उसकी वहीँ मौत हो गई। यह कोई अकेली घटना नहीं है। विशेषज्ञ बताते हैं कि हवाई फायरिंग के बाद गोली 300 से लेकर 700 फीट/सेकेंड की गति से पृथ्‍वी पर वापस लौट सकती है जो किसी की भी जान लेने के लिए पर्याप्‍त है। हमारे संवाददाता ने इस मसले पर सेना के भी कुछ लोगों से बात की। उन्‍होंने बताया कि जब वे बंदूक से सलामी देते हैं तो यह ब्‍लैंक फायरिंग होती है, इससे किसी के जख्‍मी होने का खतरा नहीं होता है।

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2015 में भारत में फायरिंग की घटनाओं में मारे गए लोग

उत्‍तर प्रदेश में होने वाली मौतों में सबसे ज्‍यादा संख्‍या अवैध हथियारों से मारे जाने वाले लोगों की है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2010 से 2014 के दौरान जहां आर्म्‍स एक्‍ट के तहत दर्ज होने वाले मामलों की संख्‍या घटकर आधी रह गई थी, वहीं इस दौरान अवैध हथियारों से लोगों के मारे जाने की घटनाओं में 40 फीसदी का इजाफा हुआ था। यही नहीं, 2010 से 2014 के दौरान देशभर में फायरिंग की घटनाओं में मारे गए लोगों में से करीब 40 फीसदी लोग (6,929)  उत्‍तर प्रदेश में मारे गए थे। इनमें से 90 फीसदी मौतें अवैध हथियारों से हुई थीं।

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Uttar Pradesh

केंद्र शासित प्रदेशों में से दिल्‍ली में, जो कि राष्‍ट्रीय राजधानी है, इस साल फायरिंग की घटनाओं में सबसे ज्‍यादा 75 मौतें हुईं। इनमें से 55 मौतें अवैध हथियारों से जबकि 20 मौतें लाइसेंसी हथियारों से हुईं।

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भारत में वर्ष 2008 के बाद से बिना वजह या अनजाने में मारे गए लोगों का अलग से कोई आंकड़ा उपलब्‍ध नहीं है जैसा कि नीचे दिए गए ग्राफ से स्‍पष्‍ट है। इस वर्ष भारत में फायरिंग की घटनाओं में 1639 लोग मारे गए थे। दूसरी ओर इस दौरान अमेरिका में यह आंकड़ा सिर्फ 592 था जो 2014 में घटकर 586 रह गया।

अपराधियों पर लाइसेंस का फर्क नहीं : कैप्‍टन रक्षित शर्मा – यदि हम अपने देश के आर्म्‍स एक्‍ट को सही मायनों में पूरी तरह लागू करें तो ऐसा हो सकता है। इसमें पर्याप्‍त प्रावधान हैं। लेकिन जब लाइसेंसिंग अधिकारी ऐसे अनावश्‍यक फॉर्म भरवाते हैं या ऐसी शर्तें लगाते हैं जिनका उल्‍लेख एक्‍ट में नहीं है, यह भ्रष्‍टाचार को बढ़ावा देता है। जैसा कि एक्‍ट में कहा गया है, किसी को लाइसेंस देने से पहले उसकी पृष्‍ठभूमि की गहनता से जांच होनी चाहिए। इससे अवांछित लोगों को लाइसेंस देने पर रोक लगेगी और हथियारों का अवैध व्‍यापार भी कम होगा। हालांकि लाइसेंस न देने से अपराधी किस्‍म के लोगों पर कोई खास रोक नहीं लगाई जा सकती क्‍योंकि ये लोग हमेशा अवैध तरीके से ऐसे हथियार प्राप्‍त कर लेते हैं।

सैकड़ों केस तो दर्ज ही नहीं होते

लखनऊ पूर्वी के एएसपी शिवराम यादव ने हमारे वरिष्‍ठ संवाददाता सौजन्‍य त्रिपाठी से बताया कि फायरिंग की घटनाओं में जख्‍मी हो जाने या मौत होने की स्थिति में आर्म्‍स एक्‍ट और आईपीसी की धारा 304 के अंतर्गत केस दर्ज किया जाता है। गोमतीनगर के थानाध्‍यक्ष मनोज कुमार मिश्र ने बताया कि पुलिस ऐसे मामलों में तबतक कोई कार्रवाई नहीं कर सकती जबतक कोई इसकी शिकायत दर्ज नहीं कराता है। उन्‍होंने बताया कि उन्‍नाव में अपनी पोस्टिंग के दौरान वह सार्वजनिक रूप से फायरिंग की घटनाओं के खिलाफ काफी सक्रिय रहे। उन्‍होंने अपने क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सभी गेस्‍ट हाउस और मैरेज हाल में नोटिस लगवाई थी जिसमें चेतावनी दी गई थी कि शादी-विवाह या किसी अन्‍य अवसर पर फायरिंग करने वालों पर सख्‍त कार्रवाई की जाएगी। एसएसपी मंजिल सैनी ने स्‍वीकार किया कि सार्वजनिक स्‍थानों पर फायरिंग करना एक गंभीर अपराध है। उन्‍होंने कहा कि  इसकी शिकायत मिलने पर हम तुरंत कार्रवाई करते हैं। इसका मतलब साफ है कि फायरिंग की घटनाएँ इन आंकड़ों से कहीं ज्यादा होंगी।



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