• पिछले दशक में कामकाजी महिलाओं की भागीदारी 10% कम हुई
  • शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण महिलाएं रोजगार में आगे

फराह जेहरा

एक समय था जब नौकरीपेशा महिला का मतलब अध्यापिका या नर्स की नौकरी से लगाया जाता था लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सरकार के प्रयासों और विभिन्न प्रोत्साहनों व सहायता के कारण महिलाओं को रोजगार के अधिक अवसर मिल रहे हैं। लेकिन परिणाम बहुत उत्साहवर्धक नहीं हैं। असलियत यह है कि पिछले दशक के दौरान भारत में कामकाजी महिलाओं की भागीदारी 10% तक कम हो गई है। इसका मुख्‍य कारण है सामाजिक बंदिशें. महिला रोजगार को बढ़ावा देने के सरकार के सभी प्रयास एक तरह से बेकार ही साबित हुए हैं।



क्‍या है इस अंतर का कारण?

जहां सकल घरेलू उत्पाद में 5 गुना वृद्धि हुई है, वहीं महिलाओं के कामकाज का प्रतिशत 37 से घटकर 28 रह गया है। भारत में ‘सामाजिक मानदंड’ अक्सर महिलाओं के रोजगार की दिशा में बाधा खड़ी करते हैं। महिलाएं बाहर तभी काम कर पाती हैं, जब उनके माता-पिता या पति इसकी अनुमति दें। अक्सर देखा जाता है कि बच्चों की परवरिश, पारिवारिक दबाव के चलते महिलाएं अच्छे खासे पदों पर रहने के बावजूद नौकरी छोड़ देती हैं। आज भी पढ़ाई-लिखाई के दौरान अच्‍छा कमाता-खाता लड़का मिल जाए तो उससे शादी कर देना ही परिजन अपने दायित्व की इतिश्री समझते हैं। अभी यह सोच नहीं विकसित हो रही कि पहले लड़की को भी रोजगार दिलाकर आत्मनिर्भर बनाएं और फिर उसके अनुसार लड़का देख कर शादी करें। वास्‍तव में शादी नहीं होने तक लड़कियों को बोझ समझने की सोच का ही परिणाम है कि पढ़ी-लिखी लड़कियां भी शादी के बाद घर-गृहस्थी तक सिमटकर रह जाती हैं। पढ़ी-लिखी महिलाओं में से 50 फीसदी आज भी रसोई-चौके तक ही सीमित हैं।



क्या है कारण

भारत में लगभग 48.5% आबादी महिलाओं की है लेकिन केवल 28% महिलाएं ही कामकाजी हैं। इस स्थिति के कारणों का पता लगाने के लिए हार्वर्ड केनेडी स्कूल में लोक व्‍यवहार की प्रोफेसर डॉ. रोहिणी पांडे व मोहम्‍मद कमाल की टीम  ने सह-शोधकर्ताओं के साथ-साथ मध्‍य प्रदेश में एक शोध अध्ययन शुरू किया है। डॉ. पांडे ने अध्ययन के दौरान मनरेगा कार्यक्रम में मजदूरी करने वाली कुछ महिलाओं के बैंक खाते खुलवाए ताकि उनकी मजदूरी सीधे उनके बैंक खाते में जाए। इस दौरान ऐसी महिलाओं को वित्तीय साक्षरता बढ़ाने के लिए कुछ प्रशिक्षण भी दिए गए। हालांकि यह अध्ययन अभी चल रहा है, लेकिन इससे कुछ संकेत उभरकर सामने आए हैं। जो महिलाएं सभी कार्यक्रमों में शामिल रहीं, उनमें अधिक सकारात्मक बदलाव देखने को मिले। जैसे वे मनरेगा और उसके अलावा भी काम करती थीं और उन्‍होंने 60% अधिक बैंक बैलेंस के साथ 25% अधिक कमाई की।

डॉ.पांडे ने स्व-रोजगार महिला एसोसिएशन (एसईडब्ल्यूए) बैंक के साथ भी काम किया, जहां महिलाओं के चयनित समूह के लिए दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम किया गया। बाद में उनकी ऐसी महिलाओं के समूह से तुलना की गई जो प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल नहीं थे। कुछ आश्‍चर्यजनक परिणाम सामने आए कि वो  महिलाएं जो प्रशिक्षण ले रही थीं, उनमें उन महिलाओं की तुलना में ऋण लेने की अधिक संभावना दिखी, जिन्होंने प्रशिक्षण में हिस्‍सा नहीं लिया था। साथ ही, जिन महिलाओं ने अपने दोस्तों के साथ प्रशिक्षण में हिस्‍सा लिया, उन्‍होंने व्यवसाय के लिए अपने ऋण का इस्‍तेमाल करने में अधिक उत्‍साह दिखाया। दूसरी ओर, प्रशिक्षण न लेने वाली महिलाओं ने अपने घरेलू खर्चों पर अधिक धन व्‍यय किया। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह रही कि जिन महिलाओं ने अपने साथियों के साथ भाग लिया था, बाद में उनकी घरेलू आय में अप्रत्‍याशित रूप से बढ़ोतरी देखने को मिली।

इस अध्‍ययन से यह निष्‍कर्ष भी निकला कि जो महिलाएं अपने घरेलू फैसलों में हिस्‍सा लेती हैं तो वे अपने साथ की दूसरी महिलाओं की सोच बदलने में भी मददगार होती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि वे निवेश या इस तरह के अन्‍य घरेलू फैसलों को भी प्रभावित कर सकती हैं।

संभावित उपाय

पहला और सबसे महत्वपूर्ण उपाय है कि महिलाओं को अपने कमाए पैसे पर पूरा नियंत्रण हो कि उसे कहां और कैसे खर्च करना है। इसके अलावा, महिलाओं के सामाजिक नेटवर्क पर जोर दिया जाना चाहिए, जहां वे सामाजिक संबंधों के माध्यम से दूसरों को प्रभावित कर सकती हैं।

कुछ महत्‍वपूर्ण तथ्‍य

शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं रोजगार में आगे हैं। कुल रोजगार में ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं का प्रतिशत 28.4 है।

भारत में पीएचडी के लिए पंजीकृत लोगों में से 40.5% महिलाएं हैं।