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एलपीजी लाती है संतुष्टि

बीवी से है प्यार तो ले आइये एलपीजी

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कोलंबिया विश्वविद्यालय के  विज्ञानियों का दावा, एलपीजी लाती है संतुष्टि

फराह ज़ेहरा , अनुवाद : धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी

अगर आपके किचन में एलपीजी है तो यकीन मानिये कि आपकी बीवी उन महिलाओं से कहीं ज्यादा खुश और संतुष्‍ट होगी जिनके किचन में एलपीजी नहीं है। यह दावा है कोलंबिया विश्‍वविद्यालय के विज्ञानियों का। उनका मानना है कि एलपीजी घर के सदस्‍यों में संतुष्टि लाती है। यह बात तो एक अध्ययन से निकल कर आई है लेकिन केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को संभवतः यह तथ्य पहले से ही पता था और इसी को ध्यान में रख कर 2016 में ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ की शुरुआत की गई थी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि किचेन में मिली इस ख़ुशी ने यूपी विधानसभा चुनाव में महिलाओं के वोट मोदी और योगी के खाते में जाने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की है।

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (2015) के अनुसार, विश्व में 2.7 अरब लोग अब भी खाना पकाने के लिए पारंपरिक बायोमास ईंधन (लकड़ी, कोयला इत्‍यादि) का ही उपयोग करते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार,  भारत में एलपीजी की पहुंच सिर्फ 28% लोगों तक थी लेकिन अब सरकार इसे कई गुना बढ़ाने का प्रयास कर रही है।



‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ देश के सभी घरों में, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, खाना पकाने के लिए स्वच्छ और प्रदूषण रहित ऊर्जा उपलब्ध कराने की दिशा में एक पहल है। यह योजना खास तौर पर ऐसे घरों के लिए है, जहां एलपीजी की सुविधा नहीं है। ‘हर घर एलपीजी’ का उद्देश्‍य खाना पकाने के लिए हर घर को सुरक्षित और आधुनिक सुविधा प्रदान करना है अर्थात सब्सिडी पर एलपीजी उपलब्‍ध कराना।

एलपीजी और अन्य पारंपरिक ईंधन की राज्यवार खपत

एलपीजी लाती है संतुष्टि
(स्रोत : जनगणना 2011)

सेहत पर प्रभाव

बायोमास ईंधन से उत्पन्न वायु प्रदूषण लोगों की सेहत पर काफी गंभीर दुष्‍प्रभाव डालता है। इसकी वजह से दुनिया भर में लगभग 43 लाख लोगों की असमय मौत हो जाती है, जिनमें से भारत के लोगों की संख्‍या करीब 13 लाख है। खाना पकाने के लिए बायोमास ईंधन का इस्तेमाल करने वाले लोग कई तरह की घातक बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं।

विभिन्न रोगों से होने वाली मौतें

एलपीजी लाती है संतुष्टि
(स्रोत : डब्‍लूएचओ की रिपोर्ट 2012)

लोगों को बीमारी से बचाने, उन्‍हें असमय मौत के मुंह में जाने से रोकने और देश के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए केंद्र सरकार ने ‘उज्ज्वला’ योजना तैयार की थी। लेकिन,  यहां सवाल यह उठता है कि एलपीजी से वंचित परिवार खाना पकाने के ईंधन के विकल्प के रूप में इसे अपनाने के लिए तैयार हैं? एलपीजी के उपयोग से सेहत को होने वाले लाभ के बारे में पता होने के बावजूद,  क्या ग्रामीण आबादी अपने घरों में इस आधुनिक सुविधा का उपयोग करने के लिए आर्थिक रूप से सक्षम है?

पैसे की कमी बड़ा रोड़ा

एलपीजी लाती है संतुष्टि
डॉ. जोहानेस अरपेलेनेन
एलपीजी लाती है संतुष्टि
सैंड्रा बाक्वी

कोलंबिया यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान विभाग के डॉ. जोहानेस अरपेलेनेन और सैंड्रा बाक्वी ने काउंसिल ऑफ एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वाटर (CEEW)  के सहयोग से वर्ष 2015 में एक शोध अध्ययन किया था, जिसमें पाया गया कि एलपीजी से वंचित लगभग 95% परिवार एलपीजी को अपनाने के इच्छुक नहीं हैं क्योंकि इसके लिए उनके पास पैसा ही नहीं है।

एलपीजी लाती है संतुष्टि

मॉरसेल रिसर्च एंड डेवलपमेंट प्राइवेट लिमिटेड ने, जो लखनऊ स्थित एक अनुसंधान परामर्श कंपनी है, देश के 6 राज्यों में सर्वेक्षण किया जिसमें लगभग 8,563 घरों को शामिल किया गया। मॉर्सेल के निदेशकों में से एक, अतुलेश शुक्ला का कहना है कि इस व्यापक सर्वेक्षण के माध्यम से यह पाया गया कि ग्रामीण इलाकों में लोग अब भी ज्‍यादातर खाना लकड़ी पर ही बनाते हैं, जबकि एलपीजी का इस्‍तेमाल केवल चाय या दाल बनाने के लिए किया जाता है। इसका कारण उन्‍होंने यह बताया कि उनके यहां एलपीजी की आपूर्ति बहुत अनियमित है। इस वजह से वे एलपीजी का इस्‍तेमाल बहुत किफायत से करते हैं।

एलपीजी के इस्‍तेमाल से मिलती है संतुष्टि

जब एलपीजी और बिना एलपीजी वाले घरों की तुलना करते हैं, तो पाते हैं कि एलपीजी वाले घरों के लोग ज्‍यादा संतुष्‍ट दिखाई देते हैं। इस संतुष्टि का प्रमुख कारण है लकड़ी पर होने वाला खर्च,  सुरक्षा,  खाना पकाने में कम समय और आसानी। हालांकि ग्रामीण परिवार एलपीजी से होने वाले फायदों को तो स्‍वीकार करते हैं लेकिन महीने में इस पर आने वाला खर्च अधिक होने की बात कह वे इसे इस्‍तेमाल करने में असमर्थता भी जताते हैं। इस अध्ययन में एक दिलचस्प तथ्य यह भी सामने आया कि ग्रामीण जलाऊ लकड़ी को खरीदने की अपेक्षा उसे इकट्ठा करना अधिक पसंद करते हैं। हालांकि जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करना आसान नहीं है क्‍योंकि इसमें समय और परिश्रम दोनों बहुत अधिक लगते हैं, लेकिन आम धारणा यह है कि जलाऊ लकड़ी जैसी आवश्‍यकता पर पैसा खर्च करना बुद्धिमानी नहीं है। अध्ययन में यह भी सुझाव दिया गया है कि एलपीजी के इस्‍तेमाल से घरों में धुएं से राहत, सुरक्षा, समय की बचत और भोजन की गुणवत्ता मिलती है,  जो उस पर होने वाले खर्च की तुलना में कहीं अधिक है।

लागत के अलावा, प्रशासनिक लापरवाही और जानकारी का अभाव भी ऐसे कुछ कारण हैं,  जिससे ग्रामीण परिवार पारंपरिक स्टोव या लकड़ी के चूल्‍हे की बजाय एलपीजी को अपनाने में बहुत दिलचस्‍पी नहीं दिखाते। अध्ययन से पता चलता है कि व्यावसायिक रूप से उपलब्ध बायोमास की बजाय एलपीजी का इस्तेमाल करना परिवारों के लिए अधिक व्‍यावहारिक होगा। लेकिन अब भी जरूरत के हिसाब से सिलेंडरों की नियमित आपूर्ति नहीं हो पाती है, इसलिए एलपीजी को बढ़ावा देने के लिए आवश्‍यक है कि उनकी मांग और आपूर्ति में संतुलन बनाया जाए और इसके बीच के अंतराल को कम किया जाए।

अध्ययन में यह भी कहा गया है कि एलपीजी के इस्‍तेमाल को बढ़ावा देने के लिए लोगों की धारणा को बदला जाना चाहिए। इसके अलावा, परिवर्तन लाने के लिए उनकी व्यक्तिगत संतुष्टि भी महत्वपूर्ण है। इस योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हर जरूरतमंद घर तक गैस कनेक्शन पहुंचे। इसलिए सरकार की यह महत्‍वाकांक्षी योजना तभी प्रभावी सिद्ध होगी जब प्रशासनिक स्तर पर इसके लिए गंभीरता से प्रयास हों और जागरूकता अभियान चलाए जाएं।

To read the full paper https://papers.ssrn.com/sol3/papers.cfm?abstract_id=2931705



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