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बच्‍चों को बचाना है तो ब्‍लॉक करें वर्चुअल गेम्‍स

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  • मुंबई में ‘ब्‍लू व्‍हेल’ गेम खेलते समय किशोर ने की आत्‍महत्‍या, भारत में पहला मामला
  • गेम के दौरान पूरे करने होते हैं कई खतरनाक टास्‍क, 50वें दिन ले लेता है जान
  • आखिर मार्केट में कैसे आ जाते हैं इस तरह के गेम जो ले सकते हैं किसी की जान!

क्या आप कल्‍पना कर सकते हैं कि कोई इंटरनेट गेम किसी की जान भी ले सकता है? शायद नहीं, लेकिन एक रिपोर्ट के अनुसार, कुछ साल पहले ही शुरू हुए इंटरनेट गेम ब्लू व्‍हेल’ (Blue Whale) ने दुनियाभर में अबतक 250 से ज्यादा लोगों की जान ले ली है। अकेले रूस में ही इस गेम की वजह से 130 से ज्यादा मौतें हुई हैं। पाकिस्तान व अमेरिका सहित 19 देशों में भी इसके कारण खुदकुशी के मामले सामने आए हैं। और अब बीती 29 जुलाई को भारत में भी इस गेम की वजह से आत्‍महत्‍या का पहला मामला सामने आया। मुंबई में 14 साल के एक किशोर ने यह गेम खेलते हुए टास्‍क पूरा करने के चक्‍कर में सातवीं मंजिल से कूदकर आत्‍महत्‍या कर ली। the2is.com के लिए प्रस्‍तुत है धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी की पड़ताल

आपको ध्‍यान होगा कि पिछले साल जुलाई महीने में ‘पोकेमॉन गो’ मोबाइल गेम दुनियाभर में लॉन्च हुआ था। लांच होने के 7 दिन के भीतर ही एक करोड़ से ज्‍यादा लोगों ने इसे डाउनलोड कर लिया था। हालांकि यह गेम जितना लोकप्रिय हुआ, उतना ही विवादों में भी रहा। इस गेम की वजह से लोग दुर्घटनाओं का शिकार होने लगे। दरअसल इस गेम में पोकेमॉन को पकड़ना होता है, लेकिन इस दौरान खेलने वाले को चलते रहना पड़ता है। गेम के दौरान लोग इतना खो जाते हैं कि हादसे का शिकार हो जाते हैं।



अब ताजा मामला ‘ब्‍लू व्‍हेल’ गेम को लेकर सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई के अंधेरी वेस्ट में 14 साल के मनप्रीत ने ‘ब्‍लू व्‍हेल’ गेम खेलते समय सातवीं मंजिल से छलांग लगा दी। भारत में इस तरह का यह पहला मामला है। मनप्रीत ने आत्महत्या करने से पहले 28 जुलाई को ही अपने दोस्तों को बताया था कि वह ‘ब्‍लू व्‍हेल’ गेम खेल रहा है और इस वजह से वह 31 जुलाई को स्कूल नहीं आ पाएगा, लेकिन किसी ने उसकी बात को सीरियसली नहीं लिया। इसके बाद 29 जुलाई को उसके आत्महत्या की खबर आई। जांच में पता लगा है कि आत्‍महत्‍या से दो दिन पहले मनप्रीत ने इंटरनेट पर सर्च किया था कि छत से छलांग कैसे लगाएं।

रूस में हुई गेम की शुरुआत

माना जाता है कि रूस में रहने वाले 25 साल के फिलिप बुदेकिन ने 2013 में ‘ब्‍लू व्‍हेल’ गेम की शुरुआत की थी। रूस में आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं के बीच बुदेकिन को इसी साल मई में गिरफ़्तार किया गया और उसे जेल हो गई। उस पर आरोप है कि उसने ख़ुद 16 बच्चों को इस गेम के जरिए आत्महत्या के लिए मजबूर किया। हालांकि फिलिप दावा करता है कि यह गेम समाज में सफाई के लिए है। उसका कहना है कि जिन लोगों ने भी गेम की वजह से आत्महत्या की, वो ‘बॉयोलॉजिकल वेस्ट थे। बताया जाता है कि बुदेकिन साइकोलॉजी का छात्र था और उसे यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया था।

क्‍या है ब्‍लू व्‍हेलगेम और कैसे खेला जाता है?

इंटरनेट के जरिए मोबाइल, लैपटॉप या डेस्कटॉप पर खेले जानेवाले इस गेम में 50 दिन तक रोज अलग-अलग टास्‍क बताया जाता है। हर टास्‍क पूरा करने पर उसकी तस्वीर गेम के एडमिन को भेजनी होती है। ये टास्‍क बड़े खतरनाक होते हैं। खेल का एडमिन प्रतियोगी को रोज सुबह 4.20 बजे बताता है कि आज क्‍या करना है। हर टास्क को पूरा करने के बाद हाथ पर एक कट करने के लिए कहा जाता है। टास्‍क पूरा होते-होते आखिर तक हाथ पर व्हेल की आकृति उभरती है। टास्‍क के तहत हाथ पर ब्लेड से एफ-57 उकेरकर फोटो भेजने को कहा जाता है। सुबह उठकर हॉरर वीडियो या फिल्म देखने और उसे एडमिन को भेजने का भी टास्‍क इसमें है। इसके अलावा हाथ की 3 नसों को काटकर उसकी फोटो एडमिन को भेजना भी एक चैलेंज है। गेम में सुबह ऊंची से ऊंची छत पर जाने को कहा जाता है। सभी 50 चैलेंज पूरे करने वाले को खुदकुशी करनी पड़ती है और उससे पहले एक सेल्फी लेकर अपलोड करनी होती है। बताते हैं कि अगर आप गेम से बाहर निकलने की कोशिश करेंगे तो इस गेम को चलाने वाले आपके परिवार को नुकसान पहुंचाने की धमकी देते हैं।

क्‍या कहते हैं मनोचिकित्‍सक और विशेषज्ञ

यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब हर किसी को पता है कि इस गेम में मौत ही होनी है तो लोग इसे खेलते क्यों हैं? जानकार मानते हैं कि इस गेम को रोकना बेहद मुश्किल है, लिहाज़ा माता-पिता की ही जिम्‍मेदारी है कि वे अपने बच्चों की हरकतों पर नजर रखें।

औरंगाबाद की मनोचिकित्सक मधुरा अन्वीकर कहती हैं, ‘मोबाइल गेम खेलते समय बच्चों को आनंद महसूस होता है। इससे दिमाग़ के एक हिस्से में यह अनुभव बार-बार लेने की चाह पैदा होती है। इस तरह के गेम में जो भी टास्क दिए जाते हैं, उनसे खेलने वाले की उत्सुकता बढ़ती है, साथ ही यह भावना भी पैदा होती है कि ‘मैं यह करके दिखाऊंगा’। उसे यह पता ही नहीं होता कि उसका अंजाम क्या होगा।’

प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र

दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में मनोविज्ञान विभाग के अध्‍यक्ष रहे और वर्तमान में महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के कुलपति प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र कहते हैं कि किसी एक घटना के आधार पर सामान्य निष्कर्ष निकालना बेजा होगा, फिर भी इस दिल दहलाने वाली घटना से यही लगता है कि ‘थ्रिल’ को बिना सोचे-विचारे अपने अनुभव की हद में लाना क्षणिक तौर पर बेहद उत्तेजक होता है। इतना कि अंजाम तक सोचने की फ़ुर्सत ही नहीं बचती है। नए से नए तरीक़ों को आज़माना और उनका तजुरबा ‘सेंसेशन सीकिंग’ की प्रवृत्ति को झलकाता है। आज जारी होने वाले तरह-तरह के वीडियो के दृश्य इतने गहरे असर वाले होते हैं कि कल्पना और यथार्थ का भेद मिटता जाता है और दर्शक अभिभूत हो उठता है। अनुभव में गति और तीव्रता के आयाम बेहद मारक ढंग से मन को बाँधकर असर डालते हैं। समाज से दूर ख़ुद को अकेले निजीपन के अंधेरे-उजाले में डुबाए रहना आज की आत्मलीन होती सभ्यताओं में व्यक्ति के उत्कर्ष का स्वप्न बनता जा रहा है। मेरी मर्ज़ी ! मैं जैसे भी जियूँ, रहूँ या फिर मरूँ, किसी को क्या ? पर यह खामख़याली है और ख़तरनाक भी। समाज की ओर, सामुदायिक जीवन की ओर सार्थक रूप से मुड़ना ही विकल्प है। उसे सुंदर और ग्राह्य बनाना ज़रूरी होगा।

लखनऊ विश्‍वविद्यालय में मनोविज्ञान विभाग की प्रोफेसर डॉ. अर्चना शुक्‍ला कहती हैं – 14 साल की उम्र ऐसी होती है जिसमें बच्‍चे का काफी शारीरिक विकास हो जाता है लेकिन मानसिक विकास उतना नहीं होता। उनके ऊपर प्रभाव डाला जा सकता है। अब ये प्रभाव चाहे सोशल सर्किल से हो, माता-पिता की तरफ से हो या इंटरनेट गेम का हो। वे इतने समझदार नहीं होते कि इस बात को समझ सकें कि जीवन का क्‍या मोल है। अक्‍सर बच्‍चे अपना अकेलापन दूर करने के लिए कंप्‍यूटर गेम खेलते हैं। आज हमारी महत्‍वाकांक्षाएं बहुत बड़ी हो गई हैं और कई बार ये रियलिस्टिक नहीं होतीं। जैसा हिप्‍नोटिज्‍म में होता है, कई बार ऑनलाइन दिखने वाली चीजें हमें सम्‍मोहन में डाल देती हैं और जो बच्‍चा 4-5 घंटे अपना समय ऑनलाइन बिताता है, वह कल्‍पना की दुनिया में ही जीने लगता है। यह बहुत ही दुर्भाग्‍यपूर्ण है। आज इंटरनेट पर बहुत से लोग फेक आईडी के जरिए लड़कियों को लुभाते हैं। अपने देश में ही ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, इसलिए बहुत जरूरी है कि माता-पिता इंटरनेट का इस्‍तेमाल करते समय बच्‍चों की गतिविधियों पर नजर जरूर रखें।



डॉ. शुक्‍ला बताती हैं कि आज माता-पिता बड़े गर्व से कहते हैं कि मेरा तीन साल का बच्‍चा बड़े अच्‍छे से मोबाइल चला लेता है, लेकिन वही बच्‍चा जब आगे चलकर 8 घंटे मोबाइल, कंप्‍यूटर या टीवी पर बिताने लगता है और पढ़ाई व अन्‍य चीजों पर ध्‍यान नहीं दे पाता तो यह गर्व की बात नहीं रह जाती। उन्‍होंने एक प्रसंग का जिक्र करते हुए बताया – मैंने एक आठ साल के बच्‍चे से पूछा कि वह बड़ा होकर क्‍या बनना चाहता है तो बच्‍चे ने कहा कि वह एस्‍ट्रोनॉट बनना चाहता है। यह सुनकर बड़ा अच्‍छा लगा लेकिन जब थोड़ी देर और बच्‍चे से बात की तो पता चला कि वह एडवेंचर की वजह से एस्‍ट्रोनॉट नहीं बनना चाहता था बल्कि इसलिए बनना चाहता था क्‍योंकि रॉकेट की स्‍पीड बहुत तेज होती है। बाइक और कार तो 60 और 80 की स्‍पीड में चलते हैं, लेकिन रॉकेट 600 किमी की स्‍पीड से चलता है और उस बच्‍चे के लिए स्‍पीड का महत्‍व सबसे ज्‍यादा था। जहां तक कंप्‍यूटर गेम के प्रति बच्‍चों की दिलचस्‍पी का सवाल है तो गेम बनाने वाले तो पैसे कमाने के लिए ऐसे ही गेम बनाते हैं जो बच्‍चों को आकर्षित कर सकें। आखिर हम टेंपल रन और एंग्री बर्ड जैसे गेम से बच्‍चों को क्‍या सिखा रहे हैं? यही न कि जब गुस्‍सा आए तो बम की तरह फटें !

किशोरों में प्रचलित कुछ खतरनाक गेम

एक-दूसरे को हराने और जीतने की होड़ में बच्चे लगातार कई राउंड खेलते रहते हैं और 10 मिनट का गेम खेलते-खेलते कब घंटों बीत जाते हैं, इसका पता ही नहीं चलता। यहीं से शुरू होता है गेमिंग एडिक्शन, जो बढ़ते बच्चों के विकास को प्रभावित करता है।

बच्चों के बीच लोकप्रिय कुछ गेम

जापान में 1990 के दशक के बाद यह देखने में आया कि वर्चुअल गेम ‘वारक्राफ्ट’ खेलने वाले करीब 10 लाख लोगों ने खुद को समाज की अन्‍य गतिविधियों से अलग कर लिया था। यह गेम खेलने के लिए वे घर में ही कैद होकर रह गए थे। ऐसे लोगों के लिए वहां ‘हाइकिकोमोरी’ शब्द का इस्‍तेमाल किया जाता है। जापानी मनोचिकित्‍सक डॉ. ताकाहीरो कातो के अनुसार, कई हाइकिकोमोरी इंटरनेट के आदी होने के बाद अवसाद ग्रस्त हो गए थे और उनमें जुनूनी प्रवृत्तियां बढ़ गई थीं।

क्‍या करें अभिभावक

बच्‍चे इंटरनेट गेमिंग एडिक्शन का शिकार न होने पाएं, इसके लिए उनके अभिभावकों को ही ध्‍यान देना होगा तभी वे बच्‍चों को इसके खतरे से बचा सकते हैं।

  • बच्चे को किस उम्र में कौन सा गैजेट/गेम या डिवाइस देना है, इसका चुनाव माता-पिता स्‍वयं करें।
    बच्‍चों को व्‍यस्‍त रखने के लिए उन्‍हें मोबाइल पर गेम खेलने या टीवी देखने की लत न लगाएं।
    इस बात का ध्‍यान रखें कि बच्‍चे इंटरनेट का इस्तेमाल पढ़ाई संबंधी काम के लिस ही करें।
    बच्चा अगर इंटरनेट पर गेम खेलता ही है तो उसका समय निर्धारित करें, जो आधा घंटा से अधिक न हो।
  • बच्‍चों को घर में टीवी, कंप्‍यूटर पर ज्‍यादा समय बिताने की अपेक्षा उन्‍हें आउटडोर गेम्स खेलने के लिए प्रेरित करें।
    बच्‍चा इंटरनेट पर कौन-कौन सी चीजें सर्च करता है, कौन सा गेम खेलता है, इस पर नजर रखें।



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