• ऑस्ट्रेलिया से लेकर यूरोप और उत्तरी अमेरिका तक फैला इन्फ्लूएंजा का वायरस

वायरस हमें अनेक तरह की बीमारियां देते हैं। इससे बचाव के लिए समय-समय पर टीके भी आते हैं, लेकिन ये टीके लगवाने के प्रति लोगों की दिलचस्‍पी कम ही देखने को मिलती है। इसका कारण यह है कि शायद हम अपनी सेहत के प्रति ज्‍यादा गंभीर नहीं रहते। पिछले कुछ सालों में इबोला और जिका वायरस के प्रकोप ने दुनिया के कई देशों में खलबली मचा दी थी। और अब हाल ही में ऑस्‍ट्रेलिया से लेकर यूरोप और उत्‍तरी अमेरिका में इन्‍फ्लूएंजा ने दस्‍तक दी है। एक नए अध्‍ययन में सामने आया है कि फ्लू की वजह से हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है। यही नहीं, शुगर के मरीजों के लिए भी यह खतरे की घंटी है। प्रस्‍तुत है प्रिया गौड़ की रिपोर्ट –

मनुष्य हजारों सालों से वायरस से लड़ाई लड़ता चला आ रहा है, ठीक वैसे ही जैसे लगातार अच्‍छाई और बुराई के बीच लड़ाई चलती रहती है। हमारे सामने आए दिन खबरें आती हैं कि एक नए वायरस का पता चला है जो सेहत के लिए बहुत खतरनाक है। पिछले सालों में कांगो में इबोला वायरस के कारण फैली महामारी की खबरें सुर्खियां बनी थीं। इबोला वायरस के कारण 2014 में गिनी, लाइबेरिया और सिएरा लियोन में 11,300 लोगों की मौत हो गई थी, हालांकि ये सांस द्वारा हवा में फैलने वाला वायरस नहीं था।

इसके बाद सामने आया ज़िका वायरस, जिसने पूरी दुनिया में खतरे की घंटी बजा दी थी। इसका संक्रमण मुख्‍यत: गर्भवती महिलाओं में देखने को मिला। जिका वायरस के कारण पैदा होने वाले बच्‍चों के सिर का आकार बहुत छोटा होता है और उनका दिमागी विकास भी कम होता है। जिका वायरस के संक्रमण ने दक्षिण अमेरिका, मध्य अमेरिका और कैरेबियन के डॉक्टरों और शोधकर्ताओं को उलझन में डाल दिया था। फिर 2016 में अंगोला में फैला यलो फीवर 2017 और 2018 में ब्राजील तक पहुंच गया, जिसने सैकड़ों लोगों की जान ले ली।

हमें अक्सर लगता है कि वायरस केवल हवा के माध्यम से फैलते हैं लेकिन ऐसा नहीं है। कोई जरूरी नहीं कि वायरस सामान्य रूप से छींकने और खांसने से ही फैलें, एक बार इससे प्रभावित व्‍यक्ति की सांस के संपर्क में आने से भी आप इससे संक्रमित हो सकते हैं। ये वायरस कठिन परिस्थितियों में भी 24 घंटे तक जीवित रहते हैं और इनके कारण गर्भावस्था के दौरान भ्रूण की मौत भी हो सकती है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा ही एक खतरनाक नया वायरस जल्‍द ही खबरों में होगा और लोगों को डराएगा। दरअसल यह वायरस इन्फ्लूएंजा है। इस वायरस का प्रकोप ठण्ड शुरू होने से लेकर बसंत तक रहता है। बीते कुछ हफ़्तों से फ्लू से सभी आयुवर्ग के लोगों के मरने की ख़बरें सुर्खियों में रही हैं। यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (US CDC) के कार्यवाहक निदेशक ऐनी शुचैट के मुताबिक, इस बार इसकी वजह से होने वाली मौतों की संख्‍या 2009-2010 के मुकाबले बढ़ सकती है। इसकी वजह यह है कि अब भी फ्लू बहुत तेजी से बढ़ रहा है। इस सीजन में फ्लू ऑस्ट्रेलिया से लेकर यूरोप और उत्तर अमेरिका तक फैला था, जिसकी वजह से ये लगातार ख़बरों में बना हुआ था। लेकिन यह भी सच्‍चाई है कि फ्लू सीजन खत्म होते ही लोग भूल जाते हैं कि इस फ्लू सीजन में हजारों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।

इन्फ्लूएंजा एक घातक बीमारी है। यह पहले एक व्यक्ति को संक्रमित करता है और फिर एक से दूसरे में फैलता है। इससे संक्रमित व्‍यक्ति के दूसरे रोगाणु से भी प्रभावित होने की ज्‍यादा आशंका होती है। जब उस व्‍यक्ति की मौत को रिकॉर्ड किया जाता है तो उसे नए रोगाणु से प्रभावित बताया जाता है, फ्लू से नहीं। लेकिन वास्‍तविकता यह है कि यह नया रोगाणु उस व्‍यक्ति में फ्लू से प्रभावित व्‍यक्ति से संक्रमित होने के बाद ही पनपता है। यह वायरस इतना स्‍मार्ट है कि इसे लोग सामान्यत: सर्दी-जुकाम जैसा समझते हैं, लेकिन ये कई तरह की परेशानियां पैदा करता है और कई लोगों की जान ले चुका है।

एक नए अध्‍ययन में पता चला है कि फ्लू की वजह से हार्ट अटैक का खतरा भी बढ़ जाता है। अध्‍ययन के अनुसार, फ्लू का पता चलने के बाद उसके अगले हफ्ते में हार्ट अटैक की आशंका 6 गुना बढ़ जाती है। यही नहीं, यह शुगर के मरीजों के लिए भी बहुत खतरनाक है। कई बार शुगर के मरीजों को फ्लू होने के बाद अस्‍पताल में भर्ती कराने की नौबत आ जाती है और कुछ मामलों में तो मरीज की मौत भी हो जाती है। आप कल्‍पना कीजिए कि फ्लू की शिकायत के बाद शुगर के कितने ऐसे मरीज अस्‍पताल में भर्ती होते हैं?

आज हमारे पास फ्लू की ऐसी वैक्सीन है जिसमें 70 साल से सुधार होता चला आ रहा है। पहले हमारे पास केवल एक किस्‍म के फ्लू के लिए वैक्सीन थी लेकिन अब 4 किस्‍म के फ्लू की वैक्सीन बाजार में हैं। इसके बावजूद अब हमें भविष्‍य को ध्‍यान में रखते हुए और भी एडवांस वैक्सीन बनाने की जरूरत है। लेकिन फ्लू की ये वैक्‍सीन तभी कारगर साबित होंगी, जब लोग हर साल वैक्सीनेसन कराएं। बच्चों के लिए वैक्सीन कितनी जरूरी है, ये लोगों को चाहे जितनी बार याद दिलाया जाए लेकिन वो इसे जरूरी नहीं समझते हैं, फिर चाहे डॉक्टर ही क्यों न उन्हें वैक्सीन लगवाने की सलाह दें।

इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर गम्भीर नहीं हैं। उन्हें लगता है कि वह कभी बीमार नहीं पड़ेंगे। वास्‍तव में वैक्‍सीनेशन एक बीमा पालिसी की तरह है। यही नहीं, समाज में कुछ ऐसे मिथ और अफवाहें भी हैं जो अभिभावकों को खुद और अपने बच्‍चों के टीकाकरण के लिए रोकती हैं। कुछ इंजीलवादी कहते हैं कि उन्हें फ्लू के लिए वैक्सीन की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि खुद प्रभु यीशु उन्‍हें फ्लू की वैक्सीन लगाकर भेजते हैं। वहीं कुछ लोग इस वजह से कन्‍फ्यूज में रहते हैं, जब वैज्ञानिक कहते हैं कि हर साल टीका लगवाने वालों में फ्लू होने की आशंका उन लोगों की तुलना में ज्‍यादा होती है, जो टीका नहीं लगवाते, लेकिन इसके बाद भी वे हमें टीका लगवाने की सलाह देते हैं।

चूंकि ज्यादातर लोग फ्लू का टीका नहीं लगवाते, इसलिए इसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। अगर एक व्‍यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता कम होती है तो वो दूसरे को अपने प्रभाव में शीघ्र ले लेगा, इसलिए फ्लू का टीका लगवाना केवल आपके हित में ही नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज के लिए लाभदायक है।

तो फिर सवाल उठता है कि सबसे स्मार्ट वायरस को हम मात कैसे देंगे? इसका उत्‍तर है – शिक्षा, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता अभियान और वैज्ञानिक अनुसंधान के जरिए। फ्लू वैक्सीन में आगे और भी सुधार किया जा सकता है, लेकिन अभी हमारे द्वारा इस्‍तेमाल में लाई जा रही वैक्सीन भी काफी अच्‍छी हैं। फ्लू वैक्सीन को फ्रिज में नहीं रखना चाहिए क्‍योंकि तब यह फायदा नहीं पहुंचाती है। अत: जरूरी है कि फ्लू का टीका तुरंत लगवाएं। यह हो सकता है कि इसका शत-प्रतिशत फायदा न मिले, लेकिन 50% या 40% या 30%  लोगों को भी इससे फायदा पहुंचता है तो यह टीका न लगवाने से तो बेहतर ही है। इससे समुदाय के बाकी लोगों में फ्लू का वायरस फैलने से रोकने में मदद मिलेगी।